上个月,欧盟在本世纪中叶达成“净零”排放这一集体目标的希望被成员国打破。
以波兰为首的四个国家在欧盟理事会会议上反对确定实现气候中和的具体期限。
很大程度上来看,这一结果不过是暂时的失败。“这是胜利路上的挫折,而不是胜利的终管昆廷·吉纳德说。而波兰随后表示支持在年底前确定净零结。”环境智库E3G布鲁塞尔办公室主目标。
两年来,欧洲一直稳步推进实现净零排放。法国、德国等一些欧盟国家已提出或通过了气候中和目标。
净零动力
气候中和目标将有效地促进欧盟在本世纪中叶实现温室气体排放小于吸收,至于利用国际碳信用额来实现这一目标,或各国如何分配目标等具体细节仍有待商榷。
这一想法自2015年《巴黎协定》发布以来就一直在酝酿。去年,政府间气候变化专门委员会(IPCC)发布了将气候变暖控制在1.5摄氏度以下的特别报告。之后,欧盟的气候中和目标被提上议事日程。
青年气候罢工运动、反抗灭绝( )行动等来自民众的压力也发挥了作用。与此同时,欧盟5月大选中的绿色浪潮意味着支持环保的党派可以在欧洲议会中保持权力平衡。
各国纷纷单方面采取行动。就在上个月,英国承诺将2050年的气候目标修改为净零排放,新的芬兰联合政府则承诺到2035年实现碳中和。
虽然法国率先呼吁欧盟设立净零目标,然而直到德国政府迫于国内日益增长的政治压力于上个月早些时候决定加入这一行列,人们才开始信心大增,认为欧盟领导人会正式同意设立该目标。这并不是在想当然:德国和波兰一样,都担心提高欧盟气候目标会影响本国煤炭主产地的就业。
2018年11月,欧盟委员会在提出的一个议案中提到,将到2050年实现气候中和经济,终于朝着达成净零目标的方向取得了切实的进展。议案指出,净零目标对欧洲而言不仅是可行的,而且是提高竞争力和构建新市场的机会。
2019年3月,欧盟议会投票支持设立2050年净零目标,并将欧盟2030年的减排目标从40%提升至55%。
然而,尽管发布的成果文件中包括“按照《巴黎协定》”向气候中和过渡的承诺,但却没有提到“2050年”这一关键期限。
“寻常嫌犯”
该目标需要28个欧盟成员国一致批准才能通过,但波兰、匈牙利、捷克共和国和爱沙尼亚不同意。
“反对国的数量一直在减少,3月份还只有少数国家支持这一目标,但到上周初就增加到18个,”都柏林城市大学法律和气候政治助理教授迪阿尔木德·托尔尼说。
作为维谢格拉德四国集团的一部分,斯洛伐克通常与波兰、匈牙利和捷克共和国共进退。“值得注意的是,斯洛伐克因为新就任的总统决定不再追随其他三国。”吉纳德说。“新就任的总统”指的是斯洛伐克首位女总统、绿色活动家苏珊娜·卡普托娃。
融资
波兰总理马泰乌什·莫拉维茨基称其反对净零目标是为了“保护波兰企业和民众的利益”,并强调签署协议前必须先拿出切实的财务措施。
这一点说明,欧盟拿出钱来,让那些受气候目标严重影响的工人(如波兰煤炭行业工人)能够公平地过渡十分重要。吉纳德说,这一点需要讨论,但得有个度,因为相对激进的国家可能不愿为阻止目标制定的国家提供奖励。保加利亚和罗马尼亚有着与波兰类似的担忧,但没有阻止目标的设立。
“像波兰这样严重依赖煤炭的成员国会反对也不奇怪,”托尔尼说。“净零意味着从根本上对现代经济进行重新设计,不仅要推动其逐步远离化石燃料,而且还要转型。”
吉纳德说,导致目标设立受阻的可能还有两个因素。
首先是波兰即将到来的大选。“气候不是一个能帮助你赢得选举的话题,”吉纳德说。另一方面,勇于抵制欧盟对其国民经济实施的强制措施反而可能赢得选票。
其次,对个别国家而言,在2050年之前实现全欧盟净零排放究竟意义何在,仍存有疑虑。“目https://www.20min.ch/schweiz/的实际上是确定政治目标,然后再研究达成目标的细节,”吉纳德说。但这样波兰就会怀疑,更广泛的目标中是否会给脱碳困难的国家留出灵活空间。“这说明需要讨论并解决这些国家提出的关切,”吉纳德说。
然而,波兰本周表示可能会在2019年年底前支持达成2050目标。“我们可能会同意达成目标,只是需要知道成本多少,以及如何减轻整个转型的社会影响。”波兰负责能源事务的副国务卿托马斯·德布洛夫斯基周四在伦敦举行的一次会议上表示。
他还说,需要“某种补偿机制”来解决波兰承担的费用。
下一步行动
欧盟目前不太可能在9月联合国气候峰会召开前达成2050年的目标,也无法借此理直气壮地鼓励其他国家在2020年制定下一轮气候承诺前提高斗志。
虽然峰会重点关注的是未来10到15年的目标,但2050年的目标也被视为制定这些目标的重要参考。
《巴黎协定》还要求各方在2020年之前向联合国提交长期气候计划,但欧盟也可以坚持目前的2050年气候目标,即一定程度上承诺在1990年的水平上减排80%到95%。
绿色非政府组织仍在向欧盟施压,要求其在2040年前实现净零排放,并更新2030年的气候目标。气候行动网络欧洲和绿色和平组织都呼吁欧盟召开紧急峰会,努力在9月联合国气候大会前达成协议。
托尔尼还说,净零目标以及针对转型困难国家的配套的气候融资和支持可能会与明年结束的欧盟预算谈判挂钩。欧盟议会已经提议拿出额外的50亿欧元设立“公正过渡基金”。
“这是一个复杂的过程,我们希望有一个恰当、合理的过渡,这需要时间,”吉纳德说。“需要所有人齐心协力。”
Tuesday, July 2, 2019
Friday, June 28, 2019
पत्रकारों के सामने बेबसी छुपा नहीं पाए हर्षवर्धन
दिमाग़ी बुख़ार के प्रकोप के बढ़ने का एक और कारण जागरुकता का अभाव माना
जा रहा है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने अपने अध्ययन की एक रिपोर्ट में कहा
है कि 'अगर राज्य में समय से पहले स्वास्थ्य जागरुकता कैंप चलाए गए होते और
परिवारों को सही जानकारी दी गई होती, तो बिहार में एक्यूट इंसेफेलाइटिस
सिंड्रोम से हुई बच्चों की भयावह मौतों को रोका जा सकता था.'
वैशाली के हरिवंशपुर गांव में सबसे अधिक 11 मौतें हुई हैं, वहां दो बेटों को खोने वाले चतुरी सहनी कहते हैं, "हर साल आंगनबाड़ी सेविकाएं हमारे टोले में आती थीं. दवाइयां, ओआरएस वग़ैरह बांटती थीं. कैंप लगता था. इस बार कोई आंगनबाड़ी सेविका हमारे तरफ़ नहीं आईं. जब हम ख़ुद आंगनबाड़ी जाते तो पता चलता कि सबक़ चुनाव ड्यूटी में हैं."
लेकिन स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय का कहना है कि 'वे सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए आंगनबाड़ी और आशा वर्कर्स को चुनाव ड्यूटी में लगाने का कोई सवाल ही नहीं है.'
जबकि आंगनबाड़ी और आशा वर्कर्स को इस बार के चुनावों में पर्दानशीं महिलाओं को पहचानने का काम दिया गया था. हर बार यह काम महिला शिक्षिकाओं के ज़िम्मे होता था.
बिहार आंगनबाड़ी वर्कर्स यूनियन की एक प्रतिनिधि ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "चुनावों में ड्यूटी करना अनिवार्य था. नहीं जाने पर स्पष्टीकरण मांगा जाता था. कई गर्भवती महिला वर्कर्स की उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ड्यूटी लगाई गई."
सवाल इस बात पर भी उठ रहे हैं कि सरकार ने पैसा रहते हुए अस्पतालों को दुरुस्त करने का काम नहीं किया.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से संसद को दी गई जानकारी के मुताबिक़, "साल 2018-19 के दौरान बिहार सरकार को नेशनल हेल्थ मिशन के तहत 2.65 करोड़ रुपए दिए गए थे, जिसमें केवल 75.46 लाख़ रुपए ही ख़र्च हुए. बिहार ने इस योजना के तहत स्वास्थ्य मेले और जागरूकता कैंप लगाने के लिए आवंटित धन का 30 फ़ीसद भी ख़र्च नहीं किया."
वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं, "दो-तीन दिन पहले हमलोग मोतिहारी में कैंप लगा रहे थे. एक बच्चे में दिमाग़ी बुख़ार के सारे लक्षण दिख रहे थे. उसे क़रीब के पीएचसी में गया लेकिन वहां बुख़ार मापने के लिए थर्मामीटर तक नहीं था. स्टाफ़ ने हमसे ही थर्मामीटर मांग लिया."
वो कहते हैं, "इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सरकार और सिस्टम इसे लेकर कितना गंभीर है. अस्पताल में एक थर्मामीटर का नहीं होना और क्या ही कहता है."
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में इतनी तादाद में बच्चों की मौत के पीछे समय पर इलाज के लिए मुकम्मल इंतज़ाम का न होना सबसे बड़ा कारण है.
अगर सरकारी रिकॉर्ड की ही बात करें तो नीति आयोग की रिपोर्ट में बिहार की स्वास्थ व्यवस्था को फिसड्डी बताया गया है.
यहां 28,392 आबादी पर सिर्फ़ एक डॉक्टर है, यहां महज़ 13 मेडिकल कॉलेज, देशभर के मेडिकल कॉलेजों की सीटों का महज़ तीन फीसदी है.
बिहार में पीएचसी की हालत पहले से ख़राब है, कुल 1,833 पीएचसी में मात्र 2,078 डॉक्टर हैं. क़रीब 75 फीसदी ऐसे पीएचसी हैं जहां डॉक्टरों की समुचित व्यवस्था तक नहीं है.
पुष्यमित्र के अनुसार, "अधिकतर बच्चों की मौत अस्पताल जाने से पहले ही हो गई है. कोई अस्पताल जाते-जाते मर गया, कोई जा भी नहीं पाया. मुज़फ़्फ़रपुर के देहात और आसपास के इलाक़ों में कैंप करते हुए हमें कई ऐसे परिजन मिले जो चार-चार, पांच-पांच अस्पतालों का चक्कर लगा चुके थे. इलाज की सुविधा मुज़फ़्फ़रपुर को छोड़ कर कहीं नहीं है."
इस बीमारी के एक सामाजिक आर्थिक पक्ष भी सामने आया है. दिमाग़ी बुख़ार के अधिकांश पीड़ित बच्चे सामाजिक रूप से पिछड़े ग़रीब आबादी से आते हैं.
हरिवंशपुर में जहां 11 बच्चों की मौत हुई, वे सभी दलितों के बच्चे ही हैं. गांव में अन्य संपन्न जातियों के मुहल्ले में इस बीमारी का नामो निशान नहीं है.
अस्पताल अधीक्षक एसके शाही कहते हैं, "अभी तक के अधिकांश मामलों में यही देखा गया है कि जो ग़रीबों के बच्चे हैं, कुपोषित हैं, जिनके पास स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है और जहां पानी की समस्या है, वहीं के बच्चे मर रहे हैं. अधिकांश बच्चे शौचालय विहीन हैं. घर विहीन हैं. पीने का साफ़ पानी नहीं है."
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2014 में सबसे अधिक 355 बच्चों की मौत इनसेफ़लाइटिस के कारण हुई, जबकि 2012 में इस बीमारी से 275 बच्चों की मौत हुई थी.
जाहिर है जब तक कुपोषण नहीं ख़त्म होगा, ग़रीबी नहीं हटेगी और और ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता 24 घंटे तक नहीं होगी मौतों का सिलसिला रुक पाएगा, इसमें संदेह है.
वैशाली के हरिवंशपुर गांव में सबसे अधिक 11 मौतें हुई हैं, वहां दो बेटों को खोने वाले चतुरी सहनी कहते हैं, "हर साल आंगनबाड़ी सेविकाएं हमारे टोले में आती थीं. दवाइयां, ओआरएस वग़ैरह बांटती थीं. कैंप लगता था. इस बार कोई आंगनबाड़ी सेविका हमारे तरफ़ नहीं आईं. जब हम ख़ुद आंगनबाड़ी जाते तो पता चलता कि सबक़ चुनाव ड्यूटी में हैं."
लेकिन स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय का कहना है कि 'वे सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए आंगनबाड़ी और आशा वर्कर्स को चुनाव ड्यूटी में लगाने का कोई सवाल ही नहीं है.'
जबकि आंगनबाड़ी और आशा वर्कर्स को इस बार के चुनावों में पर्दानशीं महिलाओं को पहचानने का काम दिया गया था. हर बार यह काम महिला शिक्षिकाओं के ज़िम्मे होता था.
बिहार आंगनबाड़ी वर्कर्स यूनियन की एक प्रतिनिधि ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "चुनावों में ड्यूटी करना अनिवार्य था. नहीं जाने पर स्पष्टीकरण मांगा जाता था. कई गर्भवती महिला वर्कर्स की उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ड्यूटी लगाई गई."
सवाल इस बात पर भी उठ रहे हैं कि सरकार ने पैसा रहते हुए अस्पतालों को दुरुस्त करने का काम नहीं किया.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से संसद को दी गई जानकारी के मुताबिक़, "साल 2018-19 के दौरान बिहार सरकार को नेशनल हेल्थ मिशन के तहत 2.65 करोड़ रुपए दिए गए थे, जिसमें केवल 75.46 लाख़ रुपए ही ख़र्च हुए. बिहार ने इस योजना के तहत स्वास्थ्य मेले और जागरूकता कैंप लगाने के लिए आवंटित धन का 30 फ़ीसद भी ख़र्च नहीं किया."
वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं, "दो-तीन दिन पहले हमलोग मोतिहारी में कैंप लगा रहे थे. एक बच्चे में दिमाग़ी बुख़ार के सारे लक्षण दिख रहे थे. उसे क़रीब के पीएचसी में गया लेकिन वहां बुख़ार मापने के लिए थर्मामीटर तक नहीं था. स्टाफ़ ने हमसे ही थर्मामीटर मांग लिया."
वो कहते हैं, "इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सरकार और सिस्टम इसे लेकर कितना गंभीर है. अस्पताल में एक थर्मामीटर का नहीं होना और क्या ही कहता है."
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में इतनी तादाद में बच्चों की मौत के पीछे समय पर इलाज के लिए मुकम्मल इंतज़ाम का न होना सबसे बड़ा कारण है.
अगर सरकारी रिकॉर्ड की ही बात करें तो नीति आयोग की रिपोर्ट में बिहार की स्वास्थ व्यवस्था को फिसड्डी बताया गया है.
यहां 28,392 आबादी पर सिर्फ़ एक डॉक्टर है, यहां महज़ 13 मेडिकल कॉलेज, देशभर के मेडिकल कॉलेजों की सीटों का महज़ तीन फीसदी है.
बिहार में पीएचसी की हालत पहले से ख़राब है, कुल 1,833 पीएचसी में मात्र 2,078 डॉक्टर हैं. क़रीब 75 फीसदी ऐसे पीएचसी हैं जहां डॉक्टरों की समुचित व्यवस्था तक नहीं है.
पुष्यमित्र के अनुसार, "अधिकतर बच्चों की मौत अस्पताल जाने से पहले ही हो गई है. कोई अस्पताल जाते-जाते मर गया, कोई जा भी नहीं पाया. मुज़फ़्फ़रपुर के देहात और आसपास के इलाक़ों में कैंप करते हुए हमें कई ऐसे परिजन मिले जो चार-चार, पांच-पांच अस्पतालों का चक्कर लगा चुके थे. इलाज की सुविधा मुज़फ़्फ़रपुर को छोड़ कर कहीं नहीं है."
इस बीमारी के एक सामाजिक आर्थिक पक्ष भी सामने आया है. दिमाग़ी बुख़ार के अधिकांश पीड़ित बच्चे सामाजिक रूप से पिछड़े ग़रीब आबादी से आते हैं.
हरिवंशपुर में जहां 11 बच्चों की मौत हुई, वे सभी दलितों के बच्चे ही हैं. गांव में अन्य संपन्न जातियों के मुहल्ले में इस बीमारी का नामो निशान नहीं है.
अस्पताल अधीक्षक एसके शाही कहते हैं, "अभी तक के अधिकांश मामलों में यही देखा गया है कि जो ग़रीबों के बच्चे हैं, कुपोषित हैं, जिनके पास स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है और जहां पानी की समस्या है, वहीं के बच्चे मर रहे हैं. अधिकांश बच्चे शौचालय विहीन हैं. घर विहीन हैं. पीने का साफ़ पानी नहीं है."
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2014 में सबसे अधिक 355 बच्चों की मौत इनसेफ़लाइटिस के कारण हुई, जबकि 2012 में इस बीमारी से 275 बच्चों की मौत हुई थी.
जाहिर है जब तक कुपोषण नहीं ख़त्म होगा, ग़रीबी नहीं हटेगी और और ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता 24 घंटे तक नहीं होगी मौतों का सिलसिला रुक पाएगा, इसमें संदेह है.
Tuesday, June 25, 2019
रग्बी में परचम लहराती ये आदिवासी लड़कियां
'किस' के रग्बी कोच रुद्रकेश जेना का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की सहूलियतें बहाल करने में अभी भी उनका संस्थान कुछ पीछे है. लेकिन वे दावा करते हैं कि 'किस' में उपलब्ध सुविधाएं देश के दूसरे स्थानों के मुक़ाबले
बेहतर हैं.
वे कहते हैं, "मैं रग्बी खेलेने वाले कई देशों का दौरा कर चुका हूं और देश के दूसरे हिस्सों में जहां रग्बी खेली जाती है उन सभी स्थानों पर भी जा चूका हूं. अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आवश्यक बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में हम अभी भी थोड़ा पीछे हैं. लेकिन यहां ट्रेनिंग के लिए आवश्यक हर चीज़ उपलब्ध है."
शायद यही कारण है कि फिलिपींस दौरे से पहले भारतीय महिला टीम के 14 दिन के प्रशिक्षण शिविर का आयोजन भी 'किस' कैंपस में ही किया गया था. इस शिविर में अलग-अलगग दक्षिणी एशियाई देशों से आए चार अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षकों ने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया.
इससे पहले डॉ सामंत ने 'किस' के खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिए दक्षिण अफ्ऱीका से एक कोच को बुलाया था. फिलिपींस में जीत की 'स्टार' सुमित्रा मानती हैं कि उस प्रशिक्षण से सभी खिलाड़ियों को काफ़ी फ़ायदा हुआ.
अब तक धाविका दुती चांद ही 'किस' विश्ववियालय ('किस' का मूल प्रतिष्ठान) की 'मास्कट' रहीं हैं . लेकिन अब लगता है कि आने वाले दिनों मे खेलकूद की दुनिया में 27 हज़ार आदिवासी बच्चों के इस विशाल स्कूल से कई और सितारे उभरेंगे.
भारतीय टीम की 15 खिलाडियों में पांच ओडिशा से थीं. ये पाँचों लड़कियां भुवनेश्वर के 'कलिंग इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज' यानी 'किस' की छात्राएं हैं.
इनमें एक हैं सुमित्रा नायक जिन्होंने मैच ख़त्म होने के सिर्फ़ 2 मिनट पहले एक पेनल्टी स्कोर कर भारतीय टीम की जीत में अहम भूमिका अदा की .
उस ऐतिहासिक क्षण के बारे में पूछते ही सुमित्रा का चेहरा खिल उठता है. वे कहतीं हैं, "हमारे लिए स्कोर करना मुश्किल हो रहा था क्योंकि सिंगापुर काफ़ी तगड़ी टीम है और पिछली बार हमें बहुत बुरी तरह हरा चुकी है.''
''मैच ख़त्म होने में 2 मिनट बाक़ी थे जब मैंने तय किया की एक पेनल्टी ली जाए. मन में विश्वास था लेकिन कुछ डर भी. मैंने पेनल्टी ली और स्कोर किया. लेकिन अभी भी दो मिनट बचे थे और सिंगापुर की टीम इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी. लेकिन हमने उनके आक्रमण का डट कर मुक़ाबला किया. जब हूटर बजा और हम जीत गए, उस समय की अनुभूति मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती."
जाजपुर ज़िले के एक ग़रीब आदिवासी परिवार की लड़की सुमित्रा की मां की मृत्यु 1999 में हो गई थी. उस समय सुमत्रा बहुत छोटी थीं और उनके चार और भाई बहन भी थे.
सुमित्रा के पिता के लिए परिवार संभालना मुश्किल हो रहा था. साल 2006 में कहीं से उन्होंने 'किस' के बारे में सुना और सुमित्रा को वहां दाख़िल करा दिया.
बाद में उनके बाक़ी भाई-बहन भी वहां आ गए. साल 2007 में जब 'किस' की टीम ने लंदन में 14 वर्ष से कम आयु वर्ग की विश्व चैंपियनशिप का ख़िताब जीता, उसके बाद सुमित्रा रग्बी की क़ायल हो गईं और इस खेल में महारत हासिल करने की कोशिश में जी जान से जुट गईं.
विजयी भारतीय टीम में शामिल 'किस' की बाक़ी चार लड़कियों की कहानी भी सुमित्रा की कहानी से मिलती-जुलती है. केओन्झर ज़िले की मीनारानी हेम्ब्रम के पिता के गुज़र जाने के बाद उनकी मां रोज़गार की तलाश में भुवनेश्वर आ गयीं और लोगों के घरों में बर्तन मांजकर गुज़ारा करने लगीं. फिर उन्होंने 'किस' के बारे में सुना और मीना का एडमिशन वहां करवा दिया.
बेहद ग़रीब परिवार से आईं ये लड़कियां अगर आज एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भारत के लिए गौरव लाई हैं, तो इसका पूरा श्रेय 'किस' के फाउंडर और कंधमाल से लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्य डॉ अच्युत सामंत को जाता है.
उन्होंने न केवल इन लड़कियों को मुफ्त पढ़ने-लिखने का अवसर दिया बल्कि उनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग और बुनियादी सहूलियतें भी मुहैया करवाईं.
विजयी भारतीय महिला रग्बी टीम की एक और सदस्य हुपी माझी कहती हैं, "वे तो हमारे लिए भगवान हैं. उनका ऋृण हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते."
हमने डॉ. सामंत से पूछा कि उन्होंने रग्बी जैसे एक ऐसे खेल को बढ़ावा देना का क्यों सोचा जो भारत में बहुत लोकप्रिय नहीं है. इस पर उन्होंने कहा, "यह सच है की रग्बी आज भी भारत में बहुत लोकप्रिय खेल नहीं है. लेकिन ऐसा नहीं है कि हमने रग्बी के लिए ही ऐसा किया है. हमने हमेशा कोशिश की है कि सभी खेलों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों, जिससे देश के कोने-कोने में, ख़ासकर आदिवासी इलाकों में छिपी हुई प्रतिभाओं को विकसित होने का मौक़ा मिले."
'किस' के रग्बी कोच रुद्रकेश जेना का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की सहूलियतें बहाल करने में अभी भी उनका संस्थान कुछ पीछे है. लेकिन वे दावा करते हैं कि 'किस' में उपलब्ध सुविधाएं देश के दूसरे स्थानों के मुक़ाबले बेहतर हैं.
वे कहते हैं, "मैं रग्बी खेलेने वाले कई देशों का दौरा कर चुका हूं और देश के दूसरे हिस्सों में जहां रग्बी खेली जाती है उन सभी स्थानों पर भी जा चूका हूं. अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आवश्यक बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में हम अभी भी थोड़ा पीछे हैं. लेकिन यहां ट्रेनिंग के लिए आवश्यक हर चीज़ उपलब्ध है."
शायद यही कारण है कि फिलिपींस दौरे से पहले भारतीय महिला टीम के 14 दिन के प्रशिक्षण शिविर का आयोजन भी 'किस' कैंपस में ही किया गया था. इस शिविर में अलग-अलगग दक्षिणी एशियाई देशों से आए चार अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षकों ने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया.
वे कहते हैं, "मैं रग्बी खेलेने वाले कई देशों का दौरा कर चुका हूं और देश के दूसरे हिस्सों में जहां रग्बी खेली जाती है उन सभी स्थानों पर भी जा चूका हूं. अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आवश्यक बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में हम अभी भी थोड़ा पीछे हैं. लेकिन यहां ट्रेनिंग के लिए आवश्यक हर चीज़ उपलब्ध है."
शायद यही कारण है कि फिलिपींस दौरे से पहले भारतीय महिला टीम के 14 दिन के प्रशिक्षण शिविर का आयोजन भी 'किस' कैंपस में ही किया गया था. इस शिविर में अलग-अलगग दक्षिणी एशियाई देशों से आए चार अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षकों ने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया.
इससे पहले डॉ सामंत ने 'किस' के खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिए दक्षिण अफ्ऱीका से एक कोच को बुलाया था. फिलिपींस में जीत की 'स्टार' सुमित्रा मानती हैं कि उस प्रशिक्षण से सभी खिलाड़ियों को काफ़ी फ़ायदा हुआ.
अब तक धाविका दुती चांद ही 'किस' विश्ववियालय ('किस' का मूल प्रतिष्ठान) की 'मास्कट' रहीं हैं . लेकिन अब लगता है कि आने वाले दिनों मे खेलकूद की दुनिया में 27 हज़ार आदिवासी बच्चों के इस विशाल स्कूल से कई और सितारे उभरेंगे.
फिलिपींस की राजधानी मनीला में भारतीय महिला रग्बी टीम ने इतिहास रचा है.
एशियाई
रग्बी चैंपियनशिप के आख़िरी मैच में शक्तिशाली सिंगापुर की टीम को 21-19 से हराकर भारतीय महिला टीम ने न केवल किसी '15-ए-साइड' अंतरराष्ट्रीय
टूर्नामेंट में अपनी पहली जीत हासिल की, बल्कि कांस्य पदक भी जीता.भारतीय टीम की 15 खिलाडियों में पांच ओडिशा से थीं. ये पाँचों लड़कियां भुवनेश्वर के 'कलिंग इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज' यानी 'किस' की छात्राएं हैं.
इनमें एक हैं सुमित्रा नायक जिन्होंने मैच ख़त्म होने के सिर्फ़ 2 मिनट पहले एक पेनल्टी स्कोर कर भारतीय टीम की जीत में अहम भूमिका अदा की .
उस ऐतिहासिक क्षण के बारे में पूछते ही सुमित्रा का चेहरा खिल उठता है. वे कहतीं हैं, "हमारे लिए स्कोर करना मुश्किल हो रहा था क्योंकि सिंगापुर काफ़ी तगड़ी टीम है और पिछली बार हमें बहुत बुरी तरह हरा चुकी है.''
''मैच ख़त्म होने में 2 मिनट बाक़ी थे जब मैंने तय किया की एक पेनल्टी ली जाए. मन में विश्वास था लेकिन कुछ डर भी. मैंने पेनल्टी ली और स्कोर किया. लेकिन अभी भी दो मिनट बचे थे और सिंगापुर की टीम इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी. लेकिन हमने उनके आक्रमण का डट कर मुक़ाबला किया. जब हूटर बजा और हम जीत गए, उस समय की अनुभूति मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती."
जाजपुर ज़िले के एक ग़रीब आदिवासी परिवार की लड़की सुमित्रा की मां की मृत्यु 1999 में हो गई थी. उस समय सुमत्रा बहुत छोटी थीं और उनके चार और भाई बहन भी थे.
सुमित्रा के पिता के लिए परिवार संभालना मुश्किल हो रहा था. साल 2006 में कहीं से उन्होंने 'किस' के बारे में सुना और सुमित्रा को वहां दाख़िल करा दिया.
बाद में उनके बाक़ी भाई-बहन भी वहां आ गए. साल 2007 में जब 'किस' की टीम ने लंदन में 14 वर्ष से कम आयु वर्ग की विश्व चैंपियनशिप का ख़िताब जीता, उसके बाद सुमित्रा रग्बी की क़ायल हो गईं और इस खेल में महारत हासिल करने की कोशिश में जी जान से जुट गईं.
विजयी भारतीय टीम में शामिल 'किस' की बाक़ी चार लड़कियों की कहानी भी सुमित्रा की कहानी से मिलती-जुलती है. केओन्झर ज़िले की मीनारानी हेम्ब्रम के पिता के गुज़र जाने के बाद उनकी मां रोज़गार की तलाश में भुवनेश्वर आ गयीं और लोगों के घरों में बर्तन मांजकर गुज़ारा करने लगीं. फिर उन्होंने 'किस' के बारे में सुना और मीना का एडमिशन वहां करवा दिया.
बेहद ग़रीब परिवार से आईं ये लड़कियां अगर आज एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भारत के लिए गौरव लाई हैं, तो इसका पूरा श्रेय 'किस' के फाउंडर और कंधमाल से लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्य डॉ अच्युत सामंत को जाता है.
उन्होंने न केवल इन लड़कियों को मुफ्त पढ़ने-लिखने का अवसर दिया बल्कि उनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग और बुनियादी सहूलियतें भी मुहैया करवाईं.
विजयी भारतीय महिला रग्बी टीम की एक और सदस्य हुपी माझी कहती हैं, "वे तो हमारे लिए भगवान हैं. उनका ऋृण हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते."
हमने डॉ. सामंत से पूछा कि उन्होंने रग्बी जैसे एक ऐसे खेल को बढ़ावा देना का क्यों सोचा जो भारत में बहुत लोकप्रिय नहीं है. इस पर उन्होंने कहा, "यह सच है की रग्बी आज भी भारत में बहुत लोकप्रिय खेल नहीं है. लेकिन ऐसा नहीं है कि हमने रग्बी के लिए ही ऐसा किया है. हमने हमेशा कोशिश की है कि सभी खेलों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों, जिससे देश के कोने-कोने में, ख़ासकर आदिवासी इलाकों में छिपी हुई प्रतिभाओं को विकसित होने का मौक़ा मिले."
'किस' के रग्बी कोच रुद्रकेश जेना का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की सहूलियतें बहाल करने में अभी भी उनका संस्थान कुछ पीछे है. लेकिन वे दावा करते हैं कि 'किस' में उपलब्ध सुविधाएं देश के दूसरे स्थानों के मुक़ाबले बेहतर हैं.
वे कहते हैं, "मैं रग्बी खेलेने वाले कई देशों का दौरा कर चुका हूं और देश के दूसरे हिस्सों में जहां रग्बी खेली जाती है उन सभी स्थानों पर भी जा चूका हूं. अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आवश्यक बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में हम अभी भी थोड़ा पीछे हैं. लेकिन यहां ट्रेनिंग के लिए आवश्यक हर चीज़ उपलब्ध है."
शायद यही कारण है कि फिलिपींस दौरे से पहले भारतीय महिला टीम के 14 दिन के प्रशिक्षण शिविर का आयोजन भी 'किस' कैंपस में ही किया गया था. इस शिविर में अलग-अलगग दक्षिणी एशियाई देशों से आए चार अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षकों ने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया.
Sunday, June 9, 2019
يرجع تاريخ كنيسة الثالوث المقدس في روثويل إلى القرن الثالث عشر.
وخلال الدوربار، الذي يجذب الكثير من السياح، يمتطي الأمير جوادا في المدينة مصحوبا بحاشيته في أزيائهم التقليدية الملونة ثم يصطف الناس لإبداء
الاحترام والتوقير له، في تقاليد تجعل سكان كانو يشعرون بالفخر.
وكانت محاولة سابقة من أحد حكام الولاية في ثمانينيات القرن الماضي لتقسيم الإمارة قد أسفرت عن وقوع اشتباكات.
توجد القرية بين جبلين في منطقة غاتس الغربية التي يمر عبرها نهر سالاوليم، أحد روافد نهر رئيسي في غوا.
كانت تلك القرية يوما ما مزدهرة في جنوب شرق غوا.
ولم تعد القرية موجودة في عام 1986، كما يعلم سكانها. فبعد بناء أول سد في الولاية، غمرت المياه القرية بالكامل.
بيد أن المياه تنحسر كل عام في شهر مايو/أيار لتكشف ما تبقى من القرية.
وتظهر الأرض المتصدعة، وجذوع الأشجار، وبقايا منازل ومعابد دينية متآكلة، وبقايا الأدوات المنزلية، وأطلال قنوات المياه، وأميال من الأرض الجرداء التي تتقاطع مع المسطحات المائية.
كانت أرض القرية خصبة وكان معظم سكانها، الذين كان يبلغ تعدادهم نحو 3 آلاف نسمة، يعيشون فيها، ويحرثون حقول الأرز المحاطة بأشجار جوز الهند والكاجو والمانجو والجزر.
كان الهندوس والمسلمون والمسيحيون يعيشون معا. وكانت القرية تضم معبدا رئيسيا ومعابد أصغر وكنيسة وضريحا إسلاميا، وهي مسقط رأس المغنية الكلاسيكية الشهيرة موغباي كوردكار.
بيد أن الأمور تغيرت على نحو كبير بعد تحرير غوا عام 1961 من سيطرة البرتغاليينوزار داياناند باندودكار، رئيس وزراء الولاية، القرية وأعلن عن بناء السد الأول في الولاية. وجمع كل سكان القرية وأخبرهم بأنه سيفيد كل غوا الجنوبية.
ويقول جاجانان كورديكار، البالغ من العمر 75 عاما، والذي يحتفظ بذكريات حية عن اللقاء: "قال (باندودكار) إنه (السد) سوف يغرق قريتنا. لكن تضحياتنا ستكون من أجل خير أكبر".
واضطر كورديكار وغيره من السكان، وهم أكثر من 600 أسرة، إلى الانتقال إلى القرى المجاورة وحصلوا من الدولة على أرض وتعويض.
كان المشروع طموحا. وبُني السد على ضفاف نهر سالاوليم. وكان يطلق عليه اسم مشروع ري سالاوليم. ويهدف إلى توفير المياه لأغراض الشرب والري والأغراض الصناعية لمعظم منطقة غوا الجنوبية.
وكان من المفترض توفير حوالي 400 مليون لتر من المياه يوميا للمواطنين.
ويتذكر إيناسيو رودريغز: "عندما ذهبنا إلى القرية الجديدة، لم يكن لدينا أي شيء على الإطلاق". كانت عائلته من بين العائلات القليلة الأولى التي غادرت في عام 1982. وكان عليهم البقاء في منازل مؤقتة حتى يتمكنوا من بناء منزلهم من لا شيء، وطال الوقت بالنسبة للبعض لما يقرب من خمس سنوات.
كان غوروشاران كورديكار يبلغ من العمر 10 سنوات عندما انتقلت عائلته إلى قرية جديدة في عام 1986.
ويتذكر الفتى البالغ من العمر 42 عاما حاليا: "أتذكر والدي وهو يضع كل شيء على عجل في شاحنة صغيرة. كنت أجلس أنا أيضا في الشاحنة مع أخي وجدتي. كان والداي يتبعانا على دراجة".
وتتذكر والدته، مامتا كورديكار، ذلك اليوم بشكل أكثر وضوحا: "أعتقد أننا آخر العائلات القليلة التي غادرت القرية، كانت الأمطار قد هطلت بغزارة في الليلة السابقة. وبدأت المياه تدخل منزلنا من الحقول. اضطررنا إلى المغادرة على الفور. حتى لم أستطع أن آخذ معي مطحنة الدقيق".
ويوجد في قرية فاديم، التي يعيش فيها كورديكار حاليا، بئران كبيرتان. لكن في شهري أبريل/نيسان ومايو/أيار، بدأت تجف الآبار، فيضطر السكان إلى الاعتماد على خزانات الحكومة للحصول على مياه الشرب.
وعندما تنحسر المياه في مايو/أيار، يزور سكان كوردي الأصليون وطنهم المفقودويتجمع المسيحيون في عيد سنوي بكنيسة صغيرة. كما يحتفل الهندوس بأحد أعيادهم في المعبد خلال هذا الشهر.
وتقول فينيشا فرنانديز، عالمة اجتماع في غوا إنه "من السهل جدا بالنسبة لنا اليوم أن نحزم حقائبنا ونتحرك".
وأضافت: "لكن بالنسبة لشعب كوردي، كانت هويتهم مبنية على أرضهم. كانوا على صلة وثيقة ومباشرة بها. لذا ربما يتذكرون ذلك بشدة ويحرصون على العودة إليها".
وفحص الخبراء خمس جماجم من بين رفات 2500 شخص، ما أسفر عن نتائج أشارت إلى أن واحدة منها فقط تعرضت لكسور.
وقالت ليزي كرايغ أتكنز، أستاذة الآثار في جامعة شيفلد، إن اكتشاف إصابة في جمجمة واحدة فقط يقلل من احتمالية حدوث "مذبحة" أدت إلى مقتل هذا العدد من الناس.
وقالت ليزي: "اخترناها (الجمجمة المصابة) لمحاولة التوصل إلى القصة وراء ما حدث، وذلك لأن المشهد يرجح، في وجود هذا الكم من الرفات، أن مذبحة ما حدثت هنا."
وأضافت: "لكنها كانت الوحيدة التي بدت عليها علامات التعرض للعنف."
وأشارت إلى أن هذه العظام ربما أُخرجت من منطقة مقابر اكتظت بالجثامين.
وقال التقرير، الذي نُشر في مجلة مورتاليتي، إن القبو بُني في ممر الكنيسة بمذبح خاص به.
ويرجع تاريخ تخزين هذه العظام والجماجم أسفل الكنيسة إلى الفترة من عام 1250 إلى عام 1900، وهو ما كشفه مسح التأريخ بالكربون المشع لتحديد عمر الرفات.
وكنيسة الثالوث المقدس واحدة من 13 موقعا تاريخيا ترجع إلى القرن الثالث عشر الميلادي في بريطانيا، أبرزها سان ليونارد في هايث في كنت.
وبالنسبة لأولئك الذين يشعرون أن هناك دوافع سياسية في ما يحدث فإنهم يأملون أن تفشل هذه المحاولة أيضا
وكانت محاولة سابقة من أحد حكام الولاية في ثمانينيات القرن الماضي لتقسيم الإمارة قد أسفرت عن وقوع اشتباكات.
تقع قرية كوردي في ولاية غوا الغربية الهندية وهي قرية لا يمكن رؤيتها إلا لمدة شهر واحد فقط كل عام، إذ تختفي تحت الماء طوال 11 شهرا. وعندما تنحسر المياه، يجتمع سكانها الأصليون، الذين استقروا الآن في مكان آخر، لإقامة احتفالات في منازلهم القديمة
بالقرية.
تقرير سوبريا فوهرا يلقي الضوء على هذه القرية.توجد القرية بين جبلين في منطقة غاتس الغربية التي يمر عبرها نهر سالاوليم، أحد روافد نهر رئيسي في غوا.
كانت تلك القرية يوما ما مزدهرة في جنوب شرق غوا.
ولم تعد القرية موجودة في عام 1986، كما يعلم سكانها. فبعد بناء أول سد في الولاية، غمرت المياه القرية بالكامل.
بيد أن المياه تنحسر كل عام في شهر مايو/أيار لتكشف ما تبقى من القرية.
وتظهر الأرض المتصدعة، وجذوع الأشجار، وبقايا منازل ومعابد دينية متآكلة، وبقايا الأدوات المنزلية، وأطلال قنوات المياه، وأميال من الأرض الجرداء التي تتقاطع مع المسطحات المائية.
كانت أرض القرية خصبة وكان معظم سكانها، الذين كان يبلغ تعدادهم نحو 3 آلاف نسمة، يعيشون فيها، ويحرثون حقول الأرز المحاطة بأشجار جوز الهند والكاجو والمانجو والجزر.
كان الهندوس والمسلمون والمسيحيون يعيشون معا. وكانت القرية تضم معبدا رئيسيا ومعابد أصغر وكنيسة وضريحا إسلاميا، وهي مسقط رأس المغنية الكلاسيكية الشهيرة موغباي كوردكار.
بيد أن الأمور تغيرت على نحو كبير بعد تحرير غوا عام 1961 من سيطرة البرتغاليينوزار داياناند باندودكار، رئيس وزراء الولاية، القرية وأعلن عن بناء السد الأول في الولاية. وجمع كل سكان القرية وأخبرهم بأنه سيفيد كل غوا الجنوبية.
ويقول جاجانان كورديكار، البالغ من العمر 75 عاما، والذي يحتفظ بذكريات حية عن اللقاء: "قال (باندودكار) إنه (السد) سوف يغرق قريتنا. لكن تضحياتنا ستكون من أجل خير أكبر".
واضطر كورديكار وغيره من السكان، وهم أكثر من 600 أسرة، إلى الانتقال إلى القرى المجاورة وحصلوا من الدولة على أرض وتعويض.
كان المشروع طموحا. وبُني السد على ضفاف نهر سالاوليم. وكان يطلق عليه اسم مشروع ري سالاوليم. ويهدف إلى توفير المياه لأغراض الشرب والري والأغراض الصناعية لمعظم منطقة غوا الجنوبية.
وكان من المفترض توفير حوالي 400 مليون لتر من المياه يوميا للمواطنين.
ويتذكر إيناسيو رودريغز: "عندما ذهبنا إلى القرية الجديدة، لم يكن لدينا أي شيء على الإطلاق". كانت عائلته من بين العائلات القليلة الأولى التي غادرت في عام 1982. وكان عليهم البقاء في منازل مؤقتة حتى يتمكنوا من بناء منزلهم من لا شيء، وطال الوقت بالنسبة للبعض لما يقرب من خمس سنوات.
كان غوروشاران كورديكار يبلغ من العمر 10 سنوات عندما انتقلت عائلته إلى قرية جديدة في عام 1986.
ويتذكر الفتى البالغ من العمر 42 عاما حاليا: "أتذكر والدي وهو يضع كل شيء على عجل في شاحنة صغيرة. كنت أجلس أنا أيضا في الشاحنة مع أخي وجدتي. كان والداي يتبعانا على دراجة".
وتتذكر والدته، مامتا كورديكار، ذلك اليوم بشكل أكثر وضوحا: "أعتقد أننا آخر العائلات القليلة التي غادرت القرية، كانت الأمطار قد هطلت بغزارة في الليلة السابقة. وبدأت المياه تدخل منزلنا من الحقول. اضطررنا إلى المغادرة على الفور. حتى لم أستطع أن آخذ معي مطحنة الدقيق".
ويوجد في قرية فاديم، التي يعيش فيها كورديكار حاليا، بئران كبيرتان. لكن في شهري أبريل/نيسان ومايو/أيار، بدأت تجف الآبار، فيضطر السكان إلى الاعتماد على خزانات الحكومة للحصول على مياه الشرب.
وعندما تنحسر المياه في مايو/أيار، يزور سكان كوردي الأصليون وطنهم المفقودويتجمع المسيحيون في عيد سنوي بكنيسة صغيرة. كما يحتفل الهندوس بأحد أعيادهم في المعبد خلال هذا الشهر.
وتقول فينيشا فرنانديز، عالمة اجتماع في غوا إنه "من السهل جدا بالنسبة لنا اليوم أن نحزم حقائبنا ونتحرك".
وأضافت: "لكن بالنسبة لشعب كوردي، كانت هويتهم مبنية على أرضهم. كانوا على صلة وثيقة ومباشرة بها. لذا ربما يتذكرون ذلك بشدة ويحرصون على العودة إليها".
كشفت الاختبارات التي أُجريت لجمجمة ترجع إلى العصور الوسطى، عُثر عليها في قبو يعود إلى القرن الثالث عشر
الميلادي، عن أن الشخص المتوفى تعرض لضربة في الرأس.
ويعكف علماء
آثار منذ فترة على فحص الرفات الذي عُثر عليها في كنيسة الثالوث المقدس في روثويل في نورثامبتونشير. ولا تزال عملية الدراسة مستمرة.وفحص الخبراء خمس جماجم من بين رفات 2500 شخص، ما أسفر عن نتائج أشارت إلى أن واحدة منها فقط تعرضت لكسور.
وقالت ليزي كرايغ أتكنز، أستاذة الآثار في جامعة شيفلد، إن اكتشاف إصابة في جمجمة واحدة فقط يقلل من احتمالية حدوث "مذبحة" أدت إلى مقتل هذا العدد من الناس.
وقالت ليزي: "اخترناها (الجمجمة المصابة) لمحاولة التوصل إلى القصة وراء ما حدث، وذلك لأن المشهد يرجح، في وجود هذا الكم من الرفات، أن مذبحة ما حدثت هنا."
وأضافت: "لكنها كانت الوحيدة التي بدت عليها علامات التعرض للعنف."
وأشارت إلى أن هذه العظام ربما أُخرجت من منطقة مقابر اكتظت بالجثامين.
وقال التقرير، الذي نُشر في مجلة مورتاليتي، إن القبو بُني في ممر الكنيسة بمذبح خاص به.
ويرجع تاريخ تخزين هذه العظام والجماجم أسفل الكنيسة إلى الفترة من عام 1250 إلى عام 1900، وهو ما كشفه مسح التأريخ بالكربون المشع لتحديد عمر الرفات.
وكنيسة الثالوث المقدس واحدة من 13 موقعا تاريخيا ترجع إلى القرن الثالث عشر الميلادي في بريطانيا، أبرزها سان ليونارد في هايث في كنت.
وبالنسبة لأولئك الذين يشعرون أن هناك دوافع سياسية في ما يحدث فإنهم يأملون أن تفشل هذه المحاولة أيضا
Wednesday, May 22, 2019
خطفوني لأصبح مرشدا للمتسولين المكفوفين
رغم أن لدى صموئيل عبد الرحمن 17 أخاً وأختاً، من زوجات أبيه الأربع، إلا أنه كان يومها بمفرده مع المربية.
قيل لوالده، وهو مهندس معماري وصاحب فندق، إنه خرج لركوب دراجته في الخارج، لكنهم لم يروه مرة أخرى إلا بعد ست سنوات.لا يتذكر صموئيل، الذي اختُطف عندما كان في السابعة من عمره، اليوم الذي أُخذ فيه من منزل عائلته في مدينة كانو بشمال نيجيريا.
تتذكر أخته الكبرى فرد
لا يستطيع صموئيل البالغ من العمر ثلاثين عاماً الآن، تذكر تفاصيل اختطافه، وكل ما يتذكره هو "رحلة القطار" التي تم تسليمه في نهايتها إلى امرأة بذراع واحدة تقطن في حي عشوائي على مشارف لاغوس، معظم سكانها من المتسولين المعاقين.
أجّرته المرأة وقتها إلى متسول أعمى مقابل خمسة دولارات لليوم الواحد.
وظاهرة الرجال والنساء المكفوفين الذين يرشدهم أطفال صغار منتشرة في شوارع نيجيريا، وخاصة أثناء حركة المرور الكثيفة، إذ ينقرون عادة على نوافذ السيارات، أو يحومون حول الكنائس والمساجد.
ويقول صموئيل الذي عاش مع تلك المرأة في كوخها ونام على حصيرة: "جاء حوالي خمسة أطفال صغار للعيش مع نساء أخريات في نفس الفناء خلال تلك الفترة، تم تأجيرهم جميعاً إلى متسولين مكفوفين".
لا يتذكر صموئيل إن كان فكر في عائلته أم لا خلال تلك الفترة، أو ما إذا تساءل عن مصير أفراد عائلته، ويقول: "لست متأكدًا من أنني كنت أمتلك أي مشاعر في ذلك الوقت، كنت مثل رجل آلي، أو في غيبوبة"، كل ما كان يعرفه هو أن يستيقظ ويوجه المتسول الأعمى، وكان الهدف هو جني المال وأكل الطعام والنوم، وتكرر الروتين ذاته كل يوم.
استأجره متسولون عديدون على مدى سنوات لفترات تراوحت ما بين أسبوع إلى شهر. وفي نهاية كل يوم، كان صموئيل والمتسول ينامان إلى جانب متسولين آخرين في أماكن عامة مختلفة. وإذا استمتع ورضي المتسول عن عمله معه، كان يستأجره لمدة أطول مرة أخرى.
ويقول: "كنت مثل العبد". "لم أستطع أن أقول شيئا مثل: "أريد أن أذهب أو أفعل أي شيء، كان علي أن أكون حاضراً وتحت الطلب باستمرار".
لم يكن لدى صموئيل إلا القليل من الوقت للعب بعد الانتهاء من العمل في المساء، حيث كان يلهو قليلاً مع الأطفال المتسولين الآخرين.
وكان الناس يتصدقون عليه بالطعام أثناء التسول، وفي أحيان أخرى، كان يحوم حول المطاعم ويأكل البقايا أو يبحث في حاويات القمامة.
يتذكر ذلك بقوله: "كنت جائعاً طيلة الوقت"، وبالكاد كنت أجلس لتناول الطعام خلال التسول". ويضيف: "لم أشعر أن المتسولين كانوا سيئين. كانوا يستيقظون ويذهبون إلى العمل مثل بقية الناس".
و كانوا يسافرون بالحافلات أحياناً إلى دول مجاورة مثل بنين.
كنت أحياناً ومن شدة تعبي، أتجاوز بعض من يمكن أن نتسول منهم، لكن المكفوفين في غاية الحساسية، وحاسة السمع لديهم قوية، فكانوا يعصرون ذراعي وينهرونني قائلين: "هناك شخص ما، لماذا تتحرك بعيداً؟" إنهم يحاولون جني أكبر قدر ممكن من المال.
وتقول فردوسي، الشقيقة الكبرى، إنها عندما رأت صموئيل في ديسمبر/كانون الأول 2000، سقطت على الأرض من صدمتها لرؤيته حياً، شعر صموئيل أنه يعرف تلك المرأة.
كان وقتها نحيلًا، أبلهاً غير مدرك لما يجري، ولم ينطق بكلمة واحدة، انفجرت فردوسي بالبكاء بعد رؤيته على تلك الحالة.
أخذوا صموئيل إلى حجرة في الكنيسة، غسلوا جسده وألبسوه ثياباً جديدة، وأخذوه إلى القاعة حيث ينتظر الناس، وأعطوا فردوسي ميكروفوناً لتتحدث إلى الحشد.
تتذكر فردوسي كيف كانت تبكي وهي تمسك بالميكروفون وتتحدث عن فقدان شقيقها منذ ست سنوات، عمت الفرحة الجميع. ثم أمسك رئيس الكنيسة بيد صموئيل وصلى من أجله.
وفي تلك الليلة، نامت فردوسي وشقيقها في سيارة في ساحة الكنيسة، فقد كان طريق العودة إلى منزل أسرتهما طويلاً.
وتتذكر تلك الليلة وتقول: "كنت أستيقظ طوال الليل وألقي نظرة عليه وألمسه بيدي لأتأكد من أنه أخي فعلاً".
إضافة إلى ذلك، كانت عملية إعادة دمج شقيقها في المجتمع وهو في الـ 13 من عمره، أكثر صعوبة مما كانت تتخيل. لم يرغب بالعيش مع والده، فكانت فردوسي هي من تعتني به، "كان الطفح الجلدي منتشراً في جميع أجزاء جسده، وكانت الرائحة كريهة، عدا عن ذراعه الأيمن الذي تضرر من الضغط المستمر للمتسولين المكفوفين عليه، وتطلب ذلك صور أشعة وفحوصات ومعالجة مدة عام حتى عاد كما كان.
وسي ذلك اليوم وتقول: "لم نترك وسيلة في محاولة العثور عليه إلا ولجأنا إليها".
لم تكن فردوسي التي كان عمرها وقتها 21 عاماً تعلم بأمر اختفائه في البداية. وكان شقيقها صموئيل يسرع دائماً بالرد على الهاتف والتحدث إليها عندما كانت تتصل بأسرتها خلال وجودها في السكن الجامعي، ولكن عندما انقطع عن التحدث إليها، شكت بوجود مشكلة ما، فسافرت بشكل مفاجئ إلى منزل الأسرة في أحد الأيام، فما كان على الأب إلا الكشف عن اختفاء شقيقها المفضل منذ أكثر من شهر.
وقالت فردوسي، دارت الشكوك حول المربية في البداية، ولكن بعد التحقيقات، سمحوا لها بالرحيل.
وحاولوا أيضاً، إخفاء خبر فقدان صموئيل عن والدته المطلقة لأطول فترة ممكنة. وفي كل مرة كانت تتصل الأم للتحدث مع ابنها، كانوا يختلقون أعذاراً مختلفة لإخفاء الأمر.
وفي نهاية المطاف، تم تكليف عم الصبي بمهمة لا يُحسد عليها وإخبارها بذلك.
كان البحث عنه مكثفاً، فبالإضافة إلى تحقيقات الشرطة، وضعت الأسرة إعلانات في الصحف، وأرسلت فرق البحث لتمشيط الشوارع بما في ذلك الخنادق التي ربما يُلقى بجثته فيها لو صدمته سيارة عابرة، وطلبوا النصيحة والاستشارة من رجال الدين المسلمين المعروفين باسم مالما.
وبمرور الوقت، طلب الأب من العائلة تقبل احتمال وفاة شقيقهم، بعد أن بذلوا قصارى جهدهم في عمليات البحث.
لم تستسلم فردوسي، وكرّست أطروحتها الجامعية لشقيقها المفقود، وبعد عام من التخرج، انتقلت جنوباً إلى العاصمة لاغوس بحثاً عن عمل.
اعتنقت فردوسي المسيحية، وبدأت بحضور الصلاة في كنيسة الفائزين (إحدى كبريات الكنائس في نيجيريا في ولاية أوغون خارج المدينة). وتعقد الكنيسة في شهر ديسمبر/كانون الأول من كل عام اجتماعاً مدته خمسة أيام لأعضائها من كافة أنحاء العالم. وخلال الحدث المعروف باسم "Shiloh "، يقوم بعض الأعضاء المهتمين بعرض سلعهم وخدماتهم داخل مبنى الكنيسة.
ولم تكن فردوسي تعمل في كانون الأول/ديسمبر 2000، فتقدمت بطلب للحصول على مكان صغير في الكنيسة لبيع بعض الأقمشة المصبوغة التي صنعتها والدتها.
وبينما كانت تنتظر حضور النجار لمساعدتها في تركيب طاولة العرض، جلست على كرسي لترتاح، تسند رأسها بيديها، وفجأة سمعت صوت متسول يطلب التصدق عليه، رفعت فردوسي رأسها، وكان المتسول يضع يده بحزم على كتف صبي يرتدي سترة حمراء وبنطالاً قصيراً بالياً.
صرخت فردوسي من هول المفاجأة، كان الصبي المضطرب الذي يرشد المتسول الأعمى هو شقيقها المفقود.
Monday, May 13, 2019
مساعد للبابا فرانسيس يقتحم ماسورة لإعادة الكهرباء عنوة لمبنى في روما
استعاد قس يؤدي أعمالا خيرية للبابا فرانسيس، التيار الكهربائي لمئات من الناس في أحد مباني روما، بعد أن نزل
في ماسورة تحت الأرض وفتح محول الكهرباء، بحسب ما ذكرته وسائل إعلام محلية.
وقال
الكاردينال، كونراد كارجيفيسكي، إنه فعل ما فعله بدافع "اليأس" وضرورة
التدخل لأن سكان المبنى، المملوك للدولة، قضوا أسبوعا كاملا بلا كهرباء ولا
مياه ساخنة.ويستخدم نشطاء المبنى لإيواء المشردين.
وقد قطعت شركة الكهرباء التيار الكهربائي بسبب عدم دفع الرسوم، التي بلغت 300.000 يورو، (أي ما يعادل 337.000 دولار).
ويعتقد أن المبلغ تراكم خلال سنوات منذ إعادة استخدام المبنى في عام 2013. ويقطن في البناية الآن أكثر من 400 شخص، من بينهم حوالي 100 طفل.
وقال نائب رئيس الوزراء، ماتيو سالفيني، إنه يتوقع الآن أن يدفع مساعد البابا فواتير الكهرباء المستحقة، بحسب ما نقلته عنه صحيفة (لا ريبابليكا) الإيطالية اليومية.
ووصف الكاردينال كارجيفيسكي الأحد كيف نزل إلى الماسورة، وأزال الشمع الأحمر الذي كان يغطي مفتاح الكهرباء حتى يعيد التيار الكهربائي إلى المبنى.
وقال لوكالة أنسا الإيطالية للأنباء: "تدخلت شخصيا الليلة الماضية لإعادة توصيل العداد. وكان تصرفي بدافع اليأس. إذ كان هناك أكثر من 400 شخص يعيشون بلا كهرباء، مع أسرهم، وأطفالهم، وبدون حتى تمكنهم من تشغيل مبردات الأطعمة."
وأضاف: "لم أفعل ذلك لأني كنت مخمورا".
ويقع المبنى في منطقة فايا دي سانتا كروس، وهو لا يوفر المأوى للمشردين فقط، بل يوجد به أيضا أماكن عمل، من بينها معمل للبيرة وورشة نجارة، بحسب ما قالته وسائل إعلام إيطالية.
وصف مدرب مانشستر سيتي، بيب غوارديولا، الاحتفاظ بالدوري الانجليزي هذا الموسم بأنه أصعب إنجاز حققه في مسيرته الرياضية كلها.
وقد فاز سيتي بأربعة أهداف مقابل هدف واحد أمام في برايتون بعدما كان متأخرا بهدف واحد، فحسم لقب الدوري بفارق نقطة واحدة عن ملاحقه ليفربول، الذي فاز على ولفرهامبتون بهدفين لصفر.
وهذه هي المرة الثامنة التي يفوز فيها فريق غوارديولا بالدوري من آخر 10 مواسم له كمدرب.
وقال عن تتويج فريقه سيتي: "كان علينا الفوز في 14 مباراة متتالية لضمان اللقب. هذا أصعب تتويج في حياتي".
وجاء ليفربول إلى ملعب الاتحاد في يناير/ كانون الثاني متقدما بسبع نقاط، ولكنه هزم بهدفين لهدف واحد. وكانت تلك هزيمته الوحيدة في الدوري الانجليزي هذا الموسم.
وجمع ليفربول 97 نقطة، وهي ثالث أكبر حصيلة في تاريخ الكرة الانجليزية، وراء سيتي الذي جمع 98 نقطة هذا الموسم و100 نقطة الموسم الماضي.
وشكر غوارديولا فريق ليفربول على "الأداء المتميز" وقال إن التنافس مع هذا الفريق هو الذي دفعنا إلى تحقيق هذا الانجاز الرائع 198 مقطة في موسمين".
وفاز غوارديولا بالدوري الإسباني ثلاث مرات متتالية مدربا مع فريق برشلونة، كما فاز بالدوري الألماني ثلاث مرات متتالية مع بايرن ميونيخ.
ويتوقع المدرب الإسباني، البالغ مع العمر 48 عاما، أن يكون الموسم المقبل أكثر صعوبة، إذ يسعى فريقه للاحتفاظ باللقب للمرة الثالثة على التوالي.
ويعد سيتي الفريق الوحيد الذي فاز بالدوري الانجليزي ثلاث مرات متتالية. وفعل ذلك مرتين في 1998-1999-2000، و2006-2007-2008.
Tuesday, April 23, 2019
تخصيص الوقت أسبوعيا لمهام ممتعة يعود بالفائدة على العمل والصحة معا
أعرب زعماء العالم عن صدمتهم، وتعازيهم إلى سريلانكا في هذه التفجيرات الدموية.
أطفئت أنوار العديد من المعالم الدولية البارزة، أو أضيئت بألوان علم سريلانكا، بما في ذلك برج إيفل في فرنسا، مساء الأحد تضامنا مع سريلانكا.
وأدان البابا فرانسيس، بابا روما في خطابه التقليدي في الفاتيكان، الهجمات ووصفها بالـ "العنف الوحشي" الذي استهدف المسيحيين، الذين يحتفلون بعيد الفصح.
وقال متحدث باسم الأمين العام للأمم المتحدة، أنطونيو غوتيريش، إنه "يشعر بالغضب" إزاء الهجمات، وأعرب عن أمله في" أن يتم تقديم الجناة إلى العدالة سريعا".
وعبرت رئيسة وزراء بريطانيا، تيريزا ماي، في تغريدة على موقع تويتر عن تعازيها، قائلة إن "أعمال العنف ضد الكنائس والفنادق في سريلانكا مروعة حقًا".
وأعرب الرئيس الأمريكي، دونالد ترامب، في تغريدة على موقع تويتر عن "تعازيه القلبية" في "الهجمات الإرهابية".
وكان رئيس وزراء الهند ناريندرا مودي قد أدان التفجيرات، و عبر عن تضامن بلاده مع سريلانكا في هذه المحنة وتعازيه لعائلات الضحايا، مشددا على أنه "ليس ثمة مكان لمثل هذه البربرية في منطقتنا".
أما رئيسة وزراء نيوزيلندا، حيث استهدفت هجمات مسجدا للمسلمين ما أسفر عن مقتل 50 شخصا الشهر الماضي، فقد وصفت تفجيرات سريلانكا بأنها "مدمرة".
وقالت جاسيندا أرديرن: "بشكل جماعي، علينا أن نجد الإرادة والحلول لإنهاء هذا العنف ".
تعد هجمات الأحد هي الأعنف في سريلانكا، منذ انتهاء الحرب الأهلية في هذا البلد عام 2009.
وانتهت الحرب الأهلية بهزيمة جبهة نمور التاميل، التي قاتلت لمدة 26 عامًا، من أجل وطن مستقل للأقلية التاميلية. ويُعتقد أن الحرب أسفرت عن مقتل ما بين 70 و 80 ألف شخص.
ومنذ ذلك الحين، شهدت سريلانكا أعمال عنف متفرقة. وفي مارس/ آذار الماضي، أعلنت السلطات حالة الطواريء، بعد أن هاجم أفراد من الأغلبية السنهالية البوذية مساجد وممتلكات للمسلمين.
يعد مذهب ثيرافادا البوذي أكبر الديانات في سريلانكا (ثيرافادا هو أقدم المذاهب البوذية)، حيث يشكل معتنقوه حوالي 70.2٪ من السكان، وفقًا لآخر الإحصاءات.
ويعد هذا المذهب البوذي دين الأغلبية السنهالية في سريلانكا. وتمنح تعاليمه مكانة أساسية بين قوانين البلاد، وهي معروفة وواضحة في الدستور.
ويشكل الهندوس 12.6 ٪ والمسلمون 9.7 ٪ من السكان.
وسريلانكا موطن لحوالي 1.5 مليون مسيحي، وفقا لتعداد عام 2012، غالبيتهم العظمى من الرومان الكاثوليك.
وكانت هناك مشكلة واحدة، وهي أن وولفغانغ أماديوس موتسارت لم يكن قد ألف بعد مقدمة العمل! ويبدو أن هذا الموسيقي الفذ كان يرجئ عمله حتى اللحظات الأخيرة. وكان موتسارت قد عمل فعلا خلال ذلك اليوم، لكن على شيء آخر.
وبحسب ما نشر عام 1845 من رواية للأحداث في تلك الفترة، تمكن رفاق موتسارت أخيرا من إقناعه بأنه لم يعد هناك متسع من الوقت لتأجيل الأمر أكثر من ذلك، فعاد إلى غرفته في منتصف الليل وظل يعمل دون توقف وعملت زوجته جاهدة على إبقائه مستيقظا طوال الليل. وفي النهاية، أنجز المهمة لكن عرض الأمسية التالية تأخر بسبب عدم طباعة المقدمة الموسيقية والتدرب عليها في الموعد المحدد.
وإذا كنت مثل موتسارت تقضي الوقت في أي شيء غير مهم وتؤجل عملك الأساسي حتى آخر لحظة، فقد تكون بحاجة إلى المساعدة للتغلب على هذا الأمر.
ورغم أن من يؤجلون عملهم يبدون وكأنهم فخورون بما يفعلونه، فهناك أدلة متنامية على أن تأجيل الأعمال أمر سيء.
وقد خلصت دراسة أجريت عام 2013 إلى أن من يؤجلون عملهم يحصلون على أقل الرواتب ولا يدوم عملهم طويلا، ويرجح انضمامهم لصفوف العاطلين بشكل أو آخر.
كما أنه ليس هناك متعة حقيقية تعود على المرء من تأجيل العمل، إذ نعلم في قرارة أنفسنا أن التأجيل يزيدنا توترا، وقد يصيبنا بالمرض ويدمر حياتنا.
وهناك أسلوب مبتكر لمساعدة من يعانون من تأجيل العمل. ويعتمد هذا الأسلوب على وضع جدول أسبوعي يحدد أوقاتا بعينها لمهام محددة. لكن الجديد هو جدولة الأنشطة التي يحبها المرء، وليس مهام العمل، مثل لقاء الأصدقاء على العشاء والأنشطة التي تجعل المرء سعيدا وقادرا على العمل، مثل تخصيص وقت للركض، وساعات كافية للنوم كل ليلة، وأخيرا إضافة الالتزامات المسبقة من قبيل الإجازات والاجتماعات.
ولا يحتوي الجدول أبدا على أشياء من قبيل "كتابة مذكرة" أو "الانتهاء من مشروع" أو "مراجعة للامتحانات" أو غيرها من مهام العمل التقليدية.
وكان أول من توصل إلى هذا الأسلوب هو نيل فيور، وهو عالم نفس ومتخصص في علاج مشكلة التأجيل، والذي تحدث عن ذلك الأسلوب في كتابه "العادة الراهنة" عام 1988. وقد أشاد كثيرون بهذا الأسلوب وتحدثوا عنه في مدونات ومقاطع فيديو على الإنترنت، واستشهدوا به في المؤلفات التي تقدم نصائح للمساعدة على التخلص من مشكلة التأجيل، حتى أصبح مألوفا ضمن نصائح المعالجين النفسيين.
في البداية، لاحظ فيور مخاطر التأجيل خلال عمله بجامعة كاليفورنيا في بيركلي. ففي ذلك الوقت، كان فيور قد صاغ أطروحته للدكتوراة خلال عام واحد - وهو أمر رائع للغاية، نظرا لأن الوقت يمتد في المتوسط تسعة أو عشرة أشهر أكثر مما يخطط له الطالب وتنتهي المهمة في بعض الأحيان بعد عشرات السنين (الرقم القياسي للحصول على الدكتوراة هو 77 عاما، وإن كانت هناك ظروف قهرية). لذا، بدأ فيور يقدم الدعم للأشخاص الذين يواجهون صعوبات تتعلق بالانتهاء من أطروحاتهم.
وخلال الأشهر التالية، لاحظ فيور أمرا لم يتوقعه، ويقول عن ذلك: "من انتهوا من أطروحاتهم خلال عام إلى عامين كانوا الأكثر انشغالا في حياتهم مقارنة بمن أنهوها خلال ثلاثة إلى 13 عاما، إذ كان عليهم مراعاة علاقات اجتماعية ومناسبات عامة. وفي حالتي كنت أعمل أيضا في وظيفة تأخذ من وقتي 40 ساعة أسبوعيا".
أطفئت أنوار العديد من المعالم الدولية البارزة، أو أضيئت بألوان علم سريلانكا، بما في ذلك برج إيفل في فرنسا، مساء الأحد تضامنا مع سريلانكا.
وأدان البابا فرانسيس، بابا روما في خطابه التقليدي في الفاتيكان، الهجمات ووصفها بالـ "العنف الوحشي" الذي استهدف المسيحيين، الذين يحتفلون بعيد الفصح.
وقال متحدث باسم الأمين العام للأمم المتحدة، أنطونيو غوتيريش، إنه "يشعر بالغضب" إزاء الهجمات، وأعرب عن أمله في" أن يتم تقديم الجناة إلى العدالة سريعا".
وعبرت رئيسة وزراء بريطانيا، تيريزا ماي، في تغريدة على موقع تويتر عن تعازيها، قائلة إن "أعمال العنف ضد الكنائس والفنادق في سريلانكا مروعة حقًا".
وأعرب الرئيس الأمريكي، دونالد ترامب، في تغريدة على موقع تويتر عن "تعازيه القلبية" في "الهجمات الإرهابية".
وكان رئيس وزراء الهند ناريندرا مودي قد أدان التفجيرات، و عبر عن تضامن بلاده مع سريلانكا في هذه المحنة وتعازيه لعائلات الضحايا، مشددا على أنه "ليس ثمة مكان لمثل هذه البربرية في منطقتنا".
أما رئيسة وزراء نيوزيلندا، حيث استهدفت هجمات مسجدا للمسلمين ما أسفر عن مقتل 50 شخصا الشهر الماضي، فقد وصفت تفجيرات سريلانكا بأنها "مدمرة".
وقالت جاسيندا أرديرن: "بشكل جماعي، علينا أن نجد الإرادة والحلول لإنهاء هذا العنف ".
تعد هجمات الأحد هي الأعنف في سريلانكا، منذ انتهاء الحرب الأهلية في هذا البلد عام 2009.
وانتهت الحرب الأهلية بهزيمة جبهة نمور التاميل، التي قاتلت لمدة 26 عامًا، من أجل وطن مستقل للأقلية التاميلية. ويُعتقد أن الحرب أسفرت عن مقتل ما بين 70 و 80 ألف شخص.
ومنذ ذلك الحين، شهدت سريلانكا أعمال عنف متفرقة. وفي مارس/ آذار الماضي، أعلنت السلطات حالة الطواريء، بعد أن هاجم أفراد من الأغلبية السنهالية البوذية مساجد وممتلكات للمسلمين.
يعد مذهب ثيرافادا البوذي أكبر الديانات في سريلانكا (ثيرافادا هو أقدم المذاهب البوذية)، حيث يشكل معتنقوه حوالي 70.2٪ من السكان، وفقًا لآخر الإحصاءات.
ويعد هذا المذهب البوذي دين الأغلبية السنهالية في سريلانكا. وتمنح تعاليمه مكانة أساسية بين قوانين البلاد، وهي معروفة وواضحة في الدستور.
ويشكل الهندوس 12.6 ٪ والمسلمون 9.7 ٪ من السكان.
وسريلانكا موطن لحوالي 1.5 مليون مسيحي، وفقا لتعداد عام 2012، غالبيتهم العظمى من الرومان الكاثوليك.
شعر أصدقاء الموسيقار الشهير موتسارت بالقلق عندما شاهدوه يحتسي الخمر في الثالث من نوفمبر/تشرين الثاني عام
1787، لأن ذلك كان اليوم السابق لأحدث عروضه الموسيقية آنذاك، والذي كان
يحمل اسم "دون جيوفاني".
ونعرف أن هذا العمل أصبح لاحقا أحد أشهر الأعمال الموسيقية في التاريخ وأبرز روائع الموسيقى التي مازال صداها يتردد
في دور الأوبرا حول العالم منذ مئات السنين. وكانت هناك مشكلة واحدة، وهي أن وولفغانغ أماديوس موتسارت لم يكن قد ألف بعد مقدمة العمل! ويبدو أن هذا الموسيقي الفذ كان يرجئ عمله حتى اللحظات الأخيرة. وكان موتسارت قد عمل فعلا خلال ذلك اليوم، لكن على شيء آخر.
وبحسب ما نشر عام 1845 من رواية للأحداث في تلك الفترة، تمكن رفاق موتسارت أخيرا من إقناعه بأنه لم يعد هناك متسع من الوقت لتأجيل الأمر أكثر من ذلك، فعاد إلى غرفته في منتصف الليل وظل يعمل دون توقف وعملت زوجته جاهدة على إبقائه مستيقظا طوال الليل. وفي النهاية، أنجز المهمة لكن عرض الأمسية التالية تأخر بسبب عدم طباعة المقدمة الموسيقية والتدرب عليها في الموعد المحدد.
وإذا كنت مثل موتسارت تقضي الوقت في أي شيء غير مهم وتؤجل عملك الأساسي حتى آخر لحظة، فقد تكون بحاجة إلى المساعدة للتغلب على هذا الأمر.
ورغم أن من يؤجلون عملهم يبدون وكأنهم فخورون بما يفعلونه، فهناك أدلة متنامية على أن تأجيل الأعمال أمر سيء.
وقد خلصت دراسة أجريت عام 2013 إلى أن من يؤجلون عملهم يحصلون على أقل الرواتب ولا يدوم عملهم طويلا، ويرجح انضمامهم لصفوف العاطلين بشكل أو آخر.
كما أنه ليس هناك متعة حقيقية تعود على المرء من تأجيل العمل، إذ نعلم في قرارة أنفسنا أن التأجيل يزيدنا توترا، وقد يصيبنا بالمرض ويدمر حياتنا.
وهناك أسلوب مبتكر لمساعدة من يعانون من تأجيل العمل. ويعتمد هذا الأسلوب على وضع جدول أسبوعي يحدد أوقاتا بعينها لمهام محددة. لكن الجديد هو جدولة الأنشطة التي يحبها المرء، وليس مهام العمل، مثل لقاء الأصدقاء على العشاء والأنشطة التي تجعل المرء سعيدا وقادرا على العمل، مثل تخصيص وقت للركض، وساعات كافية للنوم كل ليلة، وأخيرا إضافة الالتزامات المسبقة من قبيل الإجازات والاجتماعات.
ولا يحتوي الجدول أبدا على أشياء من قبيل "كتابة مذكرة" أو "الانتهاء من مشروع" أو "مراجعة للامتحانات" أو غيرها من مهام العمل التقليدية.
وكان أول من توصل إلى هذا الأسلوب هو نيل فيور، وهو عالم نفس ومتخصص في علاج مشكلة التأجيل، والذي تحدث عن ذلك الأسلوب في كتابه "العادة الراهنة" عام 1988. وقد أشاد كثيرون بهذا الأسلوب وتحدثوا عنه في مدونات ومقاطع فيديو على الإنترنت، واستشهدوا به في المؤلفات التي تقدم نصائح للمساعدة على التخلص من مشكلة التأجيل، حتى أصبح مألوفا ضمن نصائح المعالجين النفسيين.
في البداية، لاحظ فيور مخاطر التأجيل خلال عمله بجامعة كاليفورنيا في بيركلي. ففي ذلك الوقت، كان فيور قد صاغ أطروحته للدكتوراة خلال عام واحد - وهو أمر رائع للغاية، نظرا لأن الوقت يمتد في المتوسط تسعة أو عشرة أشهر أكثر مما يخطط له الطالب وتنتهي المهمة في بعض الأحيان بعد عشرات السنين (الرقم القياسي للحصول على الدكتوراة هو 77 عاما، وإن كانت هناك ظروف قهرية). لذا، بدأ فيور يقدم الدعم للأشخاص الذين يواجهون صعوبات تتعلق بالانتهاء من أطروحاتهم.
وخلال الأشهر التالية، لاحظ فيور أمرا لم يتوقعه، ويقول عن ذلك: "من انتهوا من أطروحاتهم خلال عام إلى عامين كانوا الأكثر انشغالا في حياتهم مقارنة بمن أنهوها خلال ثلاثة إلى 13 عاما، إذ كان عليهم مراعاة علاقات اجتماعية ومناسبات عامة. وفي حالتي كنت أعمل أيضا في وظيفة تأخذ من وقتي 40 ساعة أسبوعيا".
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