Monday, September 16, 2019

क्या ईरान और सऊदी अरब सीधे युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं?

ईरान और सऊदी अरब छद्म युद्ध तो लड़ ही रहे हैं. लेकिन हाल में सऊदी अरब के आर्थिक प्रतिष्ठानों पर हूती हमले के बाद अब स्थिति बिगड़ सकती है.
खाड़ी की समुद्री सीमा पर ईरान और सऊदी अरब एक दूसरे के सामने हैं और बढ़ते तनाव से दोनों के बीच व्यापक संघर्ष का जोखिम बढ़ रहा है.
अमरीका और अन्य पश्चिमी ताक़तों के लिए खाड़ी में उनके अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और तेल जहाजों का स्वतंत्र परिचालन आवश्यक है.
किसी भी संघर्ष की स्थिति में इस जलमार्ग पर रुकावट पड़ेगी यह लाजिम है. लिहाज़ा ऐसी स्थिति बनने पर अमरीकी जल सेना और वायु सेना भी संघर्ष में कूद पड़ेगी, इसकी आशंका है.
काफ़ी वक़्त से अमरीका और उसके सहयोगी देश मध्य-पूर्व में ईरान को एक अस्थिर ताक़त के रूप में देख रहे हैं. सऊदी नेतृत्व भी ईरान को अस्तित्व के ख़तरे के रूप में देखता है और क्राउन प्रिंस सलमान ईरान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए किसी भी हद तक जाने की बात करते हैं.
सऊदी अरब कितना असुरक्षित है यह हाल ही में उसके तेल प्रतिष्ठानों पर हुए हमले से जग ज़ाहिर हो गया है. अगर युद्ध छिड़ता भी है तो यह पूरे मंसूबे के साथ नहीं बल्कि किसी अप्रत्याशित घटना के साथ शुरू हो सकता है.
लेकिन सऊदी अरब की ख़ुद की सक्रियता, ट्रंप प्रशास
हैदराबाद के सातवें निज़ाम, मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दिक़ी के दरबार में वित्त मंत्री रहे नवाब मोईन नवाज़ जंग ने उस दौर में ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त के बैंक खाते में जो 10 लाख पाउंड भेजे थे वो आज 35 गुना बढ़ चुके हैं.
ब्रिटेन में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे हबीब इब्राहिम रहीमतुल्ला के लंदन बैक खाते में ट्रांसफर किए गए 10 लाख पाउंड (क़रीब 89 करोड़ रुपए) अब 350 लाख पाउंड (लगभग 3.1 अरब रुपए) बन चुके हैं और उन्हीं के नाम पर उनके नैटवेस्ट बैंक खाते में जमा हैं.
15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ, लेकिन दक्षिणी भारत के तेलंगाना राज्य की राजधानी हैदराबाद समेत कई राज्यों ने इस दिन आज़ादी का स्वाद नहीं चखा.
हैदराबाद 17 सितंबर 1948 तक निज़ाम शासन के तहत उनकी रियासत बना रहा था. इसके बाद 'ऑपरेशन पोलो' नाम के सैन्य अभियान के ज़रिए इस रियासत का विलय भारत में कर दिया गया.
निज़ाम और पाकिस्तान के उत्तराधिकारियों के बीच इन पैसों को लेकर लंबे वक़्त तक तनाव रहा. लंदन में मौजूद रॉयल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस में ये मामला अब भी लंबित है.
मामले में सुनवाई कर रहे जस्टिस मार्कस स्मिथ दोनों पक्षों की दलीलें सुन चुके हैं और इसी साल अक्टूबर में इस मामले में फ़ैसला देने वाले हैं.
उनका फ़ैसला ही तय करेगा कि 3.5 करोड़ पाउंड की ये राशि किसके हाथ जाएगी.
बीबीसी ने सातवें निज़ाम और पाकिस्तान के बीच चल रही इस क़ानूनी लड़ाई और पैसों के ट्रांसफर के पीछे की कहानी जानने की कोशिश की.
न की इस क्षेत्र में दिलचस्पी की वजह से कुछ हद तक एक अनिश्चितता की ओर इशारा करती है, जो इस मध्य-पूर्व में बने इस तनाव में एक और आयाम को जोड़ता है.
10 लाख पाउंड के ट्रांसफर की ये कहानी हैदराबाद के भारत में विलय होने के दौर की है.
उस वक़्त हैदराबाद आसफ़ जाह वंश के सातवें वंशज नवाब मीर उस्मान अली ख़ान सिद्दिक़ी की रियासत हुआ करती थी. उस दौर में वो दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति माने जाते थे.
'ऑपरेशन पोलो' के ज़रिए हैदराबाद के भारत में विलय होने से पहले वो हैदराबाद रियासत के सातवें और आख़िरी निज़ाम थे.
सातवें निज़ाम के पोते युवराज मुकर्रम जाह-आठवें का प्रतिनिधित्व करने वाली लॉ संस्था विदर्स वर्ल्डवाइड लॉ फर्म के पॉल हेविट्ट बताते हैं, "ऑपरेशन पोलो के दौरान हैदराबाद के निज़ाम के वित्त मंत्री ने पैसों को सुरक्षित रखने के इरादे से क़रीब 10 लाख पाउंड उस वक़्त पाकिस्तान के हाई कमिश्नर के लंदन वाले बैंक खाते में ट्रांसफर कर दिए."
1948 में ट्रांसफर किया गया यही पैसा बाद में सातवें निज़ाम के उत्तराधिकारियों और पाकिस्तान के बीच क़ानूनी जंग की वजह बन गया.
पॉल हेविट्ट बताते हैं, "जैसे ही हैदराबाद के सातवें निज़ाम को पैसों के ट्रांसफर के बारे में पता चला कि उन्होंने पाकिस्तान से कहा कि उनके पैसे जल्द लौटा दे. लेकिन रहिमतुल्ला ने पैसे वापिस देने से इनकार कर दिया और कहा कि ये अब पाकिस्तान की संपत्ति बन गई है."
इसके बाद 1954 में सातवें निज़ाम और पाकिस्तान के बीच एक क़ानूनी जंग शुरू हुई. निज़ाम ने अपने पैसे वापस पाने के लिए यूके के हाई कोर्ट का रुख़ किया और क़ानूनी प्रक्रिया शुरू की.

Thursday, August 22, 2019

الفضيحة الجنسية التي هزت الهند في العصر الفيكتوري

في شهر إبريل/نيسان من عام 1892 وُزع منشور صغير من ثماني صفحات باللغة الإنجليزية في مدينة حيدر أباد، الواقعة في أحد أكبر وأثرى الأقاليم في جنوب الهند زمن الحكم البريطاني.
تسبب المنشور في تدمير حياة شخصين : نبيل هندي مسلم يدعى مهدي حسن، وزوجته البريطانية الأصل الهندية المولد إيلين غيرترود دينيلي.
لم يكن القرن التاسع عشر هو عصر الزواج المختلط في الهند : حيث لم يمارس الحكام الجنس مع المحكومين، ناهيك عن الزواج بهم. كما كان من المستبعد تماما أن تنشأ علاقة بين رجل هندي وامرأة بيضاء.
لكن الزوجين كانا ينتميان إلى دوائر النخبة في حيدر اباد التي حكمتها اسرة "نظام".
منحت أصول وعلاقات إلين البريطانية ودور مهدي في الحكومة الإقليمية، الزوجين سلطة استثنائية في نهايات القرن التاسع عشر، وهو الأمر الذي وصل إلى درجة تلقيهما دعوة للسفر إلى لندن ولقاء الملكة فيكتوريا.
لكن صعود نجم مهدي اثار غيرة عدد من سكان حيدر أباد وشخصيات أخرى من شمالي الهند ممن يعيشون في المدينة.
حيث أصبح مهدي رئيس المحكمة العليا في حيدر أباد، قبل أن يتولى منصب وزير الداخلية في الإقليم. في نفس الوقت بدأت إلين تبرز في أوساط الدوائر الثرية في حيدر اباد، وهو ما أثار حفيظة البعض، لكن إلين ومهدي استمتعا بصعودهما الاجتماعي إلى درجة كبيرة.
لكن المنشور المذكور سرد قصة مختلفة، وأدى إلى سقوط الزوجين بشكل درامي.
لم يجد معدو المنشور الغيورون منفذا إلى مهدي فاستهدفوا زوجته إلين.
وقام مهدي بمحاولات متكررة للعمل في الحكومة المحلية في لوكنو ، حيث خدم يوما ما، على أمل الحصول على تقاعد، لكنه لم ينجح.
فقد تخلت الحكومة الكولونيالية في الهند عن مهدي وكذلك فعلت حكومة جلال أباد.
وفي النهاية فقد وظيفته كوزير داخلية، وحرم من أي مخصصات تقاعد أو تعويض.
وحين فارق الحياة في سن الثانية والخمسين لم يترك مهدي أموالا لإلين.
ومع تقدمها في السن ساءت أحوال الزوجة الصحية، وتوجهت في سنواتها الأخيرة إلى رئيس وزراء حيدر أباد للحصول على بعض التعويضات.
ونظر المسؤولون في حيدر أباد إلى طلبات إلين بعين العطف وحكموا لها بتعويض بسيط، لكنها ماتت بالطاعون بعد ذلك بفترة قصيرة.
وتضمن المنشور ثلاثة اتهامات محددة.
أولا، ادعى أن إلين كانت بائعة هوى قبل أن تتزوج مهدي، وأن كاتب المنشور وبعض أصدقائه أقاموا علاقات جنسية معها.
ثانيا، ادعى المنشور أن مهدي وإلين لم يتزوجا.
وأخيرا، ادعى المنشور أن مهدي "باع" خدمات جنسية تقدمها إلين لأعضاء بارزين في الجهاز الإداري في حيدر أباد للحصول على امتيازات.
ورفع مهدي قضية ضد دار نشر "أس أم ميترا" التي طبعت المنشور، مخالفا نصائح أصدقائه، في محكمة سيترأسها قاض بريطاني.
واستخدم المدعي والمدعى عليه محامين بريطانيين، وقدما رشى لشهود.
وفي قرار مفاجئ حكم القاضي ببراءة إدارة دار النشر، بينما لم يتطرق إلى تهم المساكنة والدعارة والخداع وشهادة الزور والرشوة والعديد من التهم الأخرى التي وردت في الدعوى.
وأصبحت فضيحة المنشور فضيحة دولية، وتابعتها حكومة جلال أباد والإدارة البريطانية في الهند والحكومة البريطانية في لندن وصحف عبر العالم على مدى تسعة شهور.
وبعد أيام من صدور الحكم، استقل مهدي وإيلين القطار عائدين إلى مدينة "لوكنو"، الواقعة شمالي الهند والتي نشأ فيها كلاهما.
مصدر الصورة فرغم تمسك الزوجين ببعضهما وسط الزوابع إلا أن قصتهما تحدت أخلاقيات الزمان مما أدى إلى دمارهما.
شكلت فضيحة المنشور نقطة النهاية في تاريخ الهند الذي كانت فيه حيدر أباد والإمارات الأخرى تحت "مستبدين شرقيين"، قبل أن ينحاز بعضهم للوطنيين.
حيث اكتسب حزب "المؤتمر الوطني الهندي"، الذي تأسس عاتم 1885، زخما وقت محاكمة مهدي وإلين عام 1892.
وبعد موت إلين بفترة وجيزة عاد مهاتما غاندي إلى الهند وعزز دور المؤتمر في الحركة من أجل حرية الهند.
وفي هذه الفترة كانت صورة أمراء الهند وفضائحهم تتراجع من الإعلام لتحل محلها أخبار الحركة الوطنية. ووسط هذا الحراك ضاعت هذه القضية.

Friday, July 5, 2019

चीन में मुसलमानः शिनजियांग में परिवारों से अलग किए जा रहे हैं बच्चे

एक नए शोध से पता चला है कि पश्चिमी चीन के शिनजियांग प्रांत में चीन जानबूझकर मुसलमान बच्चों को उनके परिवारों, धर्म, भाषा और संस्कृति से अलग कर रहा है.
चीन में दसियों लाख वयस्क मुसलमानों को भी उनके परिवारों से अलग हिरासत केंद्रों में रखा जा रहा है. चीन इन्हें पुनर्शिक्षा स्कूल कहता है.
चीन के इस इलाक़े में तेज़ी से बोर्डिंग स्कूलों का निर्माण भी किया जा रहा है.
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दस्तावेज़ों, विदेशों में रह रहे दर्जनों परिजनों के साक्षात्कारों के आधार पर बीबीसी ने अब तक के सबसे बड़े सबूत जुटाए हैं जो बताते हैं कि चीन के शिनजियांग प्रांत के बच्चों के साथ क्या हो रहा है.
रिकॉर्ड बताते हैं कि सिर्फ़ एक ही क़स्बे में चार सौ से अधिक बच्चों ने किसी न किसी तरह की हिरासत की वजह से अपने दोनों अभिभावकों को खो दिया है. वे या तो हिरासत केंद्र में हैं या जेल में.
इस बात का औपचारिक आंकलन किया जा रहा है कि क्या इन बच्चों को सेंट्रलाइज़्ड केयर (देखभाल) की ज़रूरत है.
शिनजियांग के वयस्कों की पहचान को बदलने के अलावा, इस बात के सबूत भी मिले हैं कि बच्चों को उनकी जड़ों से अलग करने का व्यवस्थित कार्यक्रम चलाया जा रहा है.
शिनजियांग में काम करने वाले विदेशी पत्रकारों पर चौबीस घंटे नज़रें रखी जाती हैं और वहां उनका पीछा किया जाता है. इसकी वजह से शिनजियांग क्षेत्र में रह रहे लोगों से बातें करना असंभव है. लेकिन बीबीसी ने तुर्की में रह रहे शिनजियांग के लोगों से बात की है.
इस्तांबुल के एक बड़े हॉल में दर्जनों लोग अपनी कहानियां बताने के लिए जुटे हैं. इनमें से कई के हाथों में बच्चों की तस्वीरे हैं. ये सभी बच्चे अब शिनजियांग में लापता हैं.
अपनी तीन साल की बेटी की तस्वीर की ओर इशारा करते हुए एक मां कहती हैं, "मैं नहीं जानती कि अब कौन उनका ध्यान रख रहा है. हमारा उनसे किसी तरह का कोई संपर्क नहीं है."
54 अलग-अलग साक्षात्कारों में, एक के बाद एक दर्दनाक गवाही मिलती है, अभिभावक और दादा-दादी शिनजियांग में लापता हुए 90 से अधिक बच्चों की कहानी बताते हैं.
ये सभी लोग शिनजियांग के वीगर समुदाय के हैं. ये चीन का प्रमुख नस्लीय मुसलमान समूह है जिसके तुर्की से नज़दीकी रिश्ते हैं. इनमें से हज़ारों पढ़ने या व्यापार करने, अपने परिजनों से मिले या फिर चीन में धार्मिक अधिकारों के हनन से बचने के लिए तुर्की आए हैं.
लेकिन बीते तीन सालों से इनमें से बहुत से तुर्की में ही फंसकर रह गए हैं क्योंकि शिनजियांग में चीन ने हज़ारों वीगर मुसलमानों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया है. वीगर मुसलमानों एवं अल्पसंख्यक समुदायों के अन्य हज़ारों लोगों को विशाल हिरासत केंद्रों में रखा जा रहा है.
चीन के अधिकारियों का कहा है कि वीगर मुसलमानों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि हिंसक धार्मिक कट्टरवाद से निबटा जा रहा है. चीन हिरासत केंद्रों को पुनर्शिक्षा स्कूल बता रहा है.
लेकिन सबूत बताते हैं कि इन दसियों लाख लोगों में से बहुत से लोगों को सिर्फ़ उनकी धार्मिक पहचान की वजह से हिरासत में लिया गया है. कई को तो नमाज़ पढ़ने, बुर्का पहनने या फिर तुर्की में किसी से संबंध होने की वजह से हिरासत में लिया गया है.
तुर्की में रह रहे इन वीगर मुसलमानों के चीन लौटने का मतलब है निश्चित तौर पर हिरासत में लिया जाना. अब फ़ोन पर बात करना भी दूभर हो गया है. शिनजियांग में रह रहे लोगों के लिए अब विदेशों में रह रहे रिश्तेदारों से संपर्क करना भी जोख़िम भरा है.
तुर्की में रह रहा एक पिता बताते हैं कि चीन में उसकी बीवी हिरासत केंद्र में हैं और उसके आठ बच्चों में से कुछ अब चीन की सरकार की देखभाल में हैं.
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि मेरे बच्चों को शिक्षा कैंपों में रखा जा रहा है."

Tuesday, July 2, 2019

欧盟2050年零碳目标的下一步是什么?

上个月,欧盟在本世纪中叶达成“净零”排放这一集体目标的希望被成员国打破。

以波兰为首的四个国家在欧盟理事会会议上反对确定实现气候中和的具体期限。

很大程度上来看,这一结果不过是暂时的失败。“这是胜利路上的挫折,而不是胜利的终管昆廷·吉纳德说。而波兰随后表示支持在年底前确定净零结。”环境智库E3G布鲁塞尔办公室主目标。

两年来,欧洲一直稳步推进实现净零排放。法国、德国等一些欧盟国家已提出或通过了气候中和目标。

净零动力

气候中和目标将有效地促进欧盟在本世纪中叶实现温室气体排放小于吸收,至于利用国际碳信用额来实现这一目标,或各国如何分配目标等具体细节仍有待商榷

这一想法自2015年《巴黎协定》发布以来就一直在酝酿。去年,政府间气候变化专门委员会(IPCC)发布了将气候变暖控制在1.5摄氏度以下的特别报告。之后,欧盟的气候中和目标被提上议事日程。

青年气候罢工运动、反抗灭绝( )行动等来自民众的压力也发挥了作用。与此同时,欧盟5月大选中的绿色浪潮意味着支持环保的党派可以在欧洲议会中保持权力平衡。

各国纷纷单方面采取行动。就在上个月,英国承诺将2050年的气候目标修改为净零排放,新的芬兰联合政府则承诺到2035年实现碳中和。

虽然法国率先呼吁欧盟设立净零目标,然而直到德国政府迫于国内日益增长的政治压力于上个月早些时候决定加入这一行列,人们才开始信心大增,认为欧盟领导人会正式同意设立该目标。这并不是在想当然:德国和波兰一样,都担心提高欧盟气候目标会影响本国煤炭主产地的就业。

2018年11月,欧盟委员会在提出的一个议案中提到,将到2050年实现气候中和经济,终于朝着达成净零目标的方向取得了切实的进展。议案指出,净零目标对欧洲而言不仅是可行的,而且是提高竞争力和构建新市场的机会。

2019年3月,欧盟议会投票支持设立2050年净零目标,并将欧盟2030年的减排目标从40%提升至55%。

然而,尽管发布的成果文件中包括“按照《巴黎协定》”向气候中和过渡的承诺,但却没有提到“2050年”这一关键期限。

“寻常嫌犯”

该目标需要28个欧盟成员国一致批准才能通过,但波兰、匈牙利、捷克共和国和爱沙尼亚不同意。

“反对国的数量一直在减少,3月份还只有少数国家支持这一目标,但到上周初就增加到18个,”都柏林城市大学法律和气候政治助理教授迪阿尔木德·托尔尼说。

作为维谢格拉德四国集团的一部分,斯洛伐克通常与波兰、匈牙利和捷克共和国共进退。“值得注意的是,斯洛伐克因为新就任的总统决定不再追随其他三国。”吉纳德说。“新就任的总统”指的是斯洛伐克首位女总统、绿色活动家苏珊娜·卡普托娃

融资

波兰总理马泰乌什·莫拉维茨基称其反对净零目标是为了“保护波兰企业和民众的利益”,并强调签署协议前必须先拿出切实的财务措施。

这一点说明,欧盟拿出钱来,让那些受气候目标严重影响的工人(如波兰煤炭行业工人)能够公平地过渡十分重要。吉纳德说,这一点需要讨论,但得有个度,因为相对激进的国家可能不愿为阻止目标制定的国家提供奖励。保加利亚和罗马尼亚有着与波兰类似的担忧,但没有阻止目标的设立。

“像波兰这样严重依赖煤炭的成员国会反对也不奇怪,”托尔尼说。“净零意味着从根本上对现代经济进行重新设计,不仅要推动其逐步远离化石燃料,而且还要转型。”

吉纳德说,导致目标设立受阻的可能还有两个因素

首先是波兰即将到来的大选。“气候不是一个能帮助你赢得选举的话题,”吉纳德说。另一方面,勇于抵制欧盟对其国民经济实施的强制措施反而可能赢得选票

其次,对个别国家而言,在2050年之前实现全欧盟净零排放究竟意义何在,仍存有疑虑。“目https://www.20min.ch/schweiz/的实际上是确定政治目标,然后再研究达成目标的细节,”吉纳德说。但这样波兰就会怀疑,更广泛的目标中是否会给脱碳困难的国家留出灵活空间。“这说明需要讨论并解决这些国家提出的关切,”吉纳德说。

然而,波兰本周表示可能会在2019年年底前支持达成2050目标。“我们可能会同意达成目标,只是需要知道成本多少,以及如何减轻整个转型的社会影响。”波兰负责能源事务的副国务卿托马斯·德布洛夫斯基周四在伦敦举行的一次会议上表示。

他还说,需要“某种补偿机制”来解决波兰承担的费用

下一步行动

欧盟目前不太可能在9月联合国气候峰会召开前达成2050年的目标,也无法借此理直气壮地鼓励其他国家在2020年制定下一轮气候承诺前提高斗志。

虽然峰会重点关注的是未来10到15年的目标,但2050年的目标也被视为制定这些目标的重要参考。

《巴黎协定》还要求各方在2020年之前向联合国提交长期气候计划,但欧盟也可以坚持目前的2050年气候目标,即一定程度上承诺在1990年的水平上减排80%到95%。

绿色非政府组织仍在向欧盟施压,要求其在2040年前实现净零排放,并更新2030年的气候目标。气候行动网络欧洲和绿色和平组织都呼吁欧盟召开紧急峰会,努力在9月联合国气候大会前达成协议。

托尔尼还说,净零目标以及针对转型困难国家的配套的气候融资和支持可能会与明年结束的欧盟预算谈判挂钩。欧盟议会已经提议拿出额外的50亿欧元设立“公正过渡基金”。

“这是一个复杂的过程,我们希望有一个恰当、合理的过渡,这需要时间,”吉纳德说。“需要所有人齐心协力。”

Friday, June 28, 2019

पत्रकारों के सामने बेबसी छुपा नहीं पाए हर्षवर्धन

दिमाग़ी बुख़ार के प्रकोप के बढ़ने का एक और कारण जागरुकता का अभाव माना जा रहा है. इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने अपने अध्ययन की एक रिपोर्ट में कहा है कि 'अगर राज्य में समय से पहले स्वास्थ्य जागरुकता कैंप चलाए गए होते और परिवारों को सही जानकारी दी गई होती, तो बिहार में एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम से हुई बच्चों की भयावह मौतों को रोका जा सकता था.'
वैशाली के हरिवंशपुर गांव में सबसे अधिक 11 मौतें हुई हैं, वहां दो बेटों को खोने वाले चतुरी सहनी कहते हैं, "हर साल आंगनबाड़ी सेविकाएं हमारे टोले में आती थीं. दवाइयां, ओआरएस वग़ैरह बांटती थीं. कैंप लगता था. इस बार कोई आंगनबाड़ी सेविका हमारे तरफ़ नहीं आईं. जब हम ख़ुद आंगनबाड़ी जाते तो पता चलता कि सबक़ चुनाव ड्यूटी में हैं."
लेकिन स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव संजय का कहना है कि 'वे सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए आंगनबाड़ी और आशा वर्कर्स को चुनाव ड्यूटी में लगाने का कोई सवाल ही नहीं है.'
जबकि आंगनबाड़ी और आशा वर्कर्स को इस बार के चुनावों में पर्दानशीं महिलाओं को पहचानने का काम दिया गया था. हर बार यह काम महिला शिक्षिकाओं के ज़िम्मे होता था.
बिहार आंगनबाड़ी वर्कर्स यूनियन की एक प्रतिनिधि ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "चुनावों में ड्यूटी करना अनिवार्य था. नहीं जाने पर स्पष्टीकरण मांगा जाता था. कई गर्भवती महिला वर्कर्स की उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ड्यूटी लगाई गई."
सवाल इस बात पर भी उठ रहे हैं कि सरकार ने पैसा रहते हुए अस्पतालों को दुरुस्त करने का काम नहीं किया.
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से संसद को दी गई जानकारी के मुताबिक़, "साल 2018-19 के दौरान बिहार सरकार को नेशनल हेल्थ मिशन के तहत 2.65 करोड़ रुपए दिए गए थे, जिसमें केवल 75.46 लाख़ रुपए ही ख़र्च हुए. बिहार ने इस योजना के तहत स्वास्थ्य मेले और जागरूकता कैंप लगाने के लिए आवंटित धन का 30 फ़ीसद भी ख़र्च नहीं किया."
वरिष्ठ पत्रकार पुष्यमित्र कहते हैं, "दो-तीन दिन पहले हमलोग मोतिहारी में कैंप लगा रहे थे. एक बच्चे में दिमाग़ी बुख़ार के सारे लक्षण दिख रहे थे. उसे क़रीब के पीएचसी में गया लेकिन वहां बुख़ार मापने के लिए थर्मामीटर तक नहीं था. स्टाफ़ ने हमसे ही थर्मामीटर मांग लिया."
वो कहते हैं, "इसी बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सरकार और सिस्टम इसे लेकर कितना गंभीर है. अस्पताल में एक थर्मामीटर का नहीं होना और क्या ही कहता है."
विशेषज्ञों का मानना है कि बिहार में इतनी तादाद में बच्चों की मौत के पीछे समय पर इलाज के लिए मुकम्मल इंतज़ाम का न होना सबसे बड़ा कारण है.
अगर सरकारी रिकॉर्ड की ही बात करें तो नीति आयोग की रिपोर्ट में बिहार की स्वास्थ व्यवस्था को फिसड्डी बताया गया है.
यहां 28,392 आबादी पर सिर्फ़ एक डॉक्टर है, यहां महज़ 13 मेडिकल कॉलेज, देशभर के मेडिकल कॉलेजों की सीटों का महज़ तीन फीसदी है.
बिहार में पीएचसी की हालत पहले से ख़राब है, कुल 1,833 पीएचसी में मात्र 2,078 डॉक्टर हैं. क़रीब 75 फीसदी ऐसे पीएचसी हैं जहां डॉक्टरों की समुचित व्यवस्था तक नहीं है.
पुष्यमित्र के अनुसार, "अधिकतर बच्चों की मौत अस्पताल जाने से पहले ही हो गई है. कोई अस्पताल जाते-जाते मर गया, कोई जा भी नहीं पाया. मुज़फ़्फ़रपुर के देहात और आसपास के इलाक़ों में कैंप करते हुए हमें कई ऐसे परिजन मिले जो चार-चार, पांच-पांच अस्पतालों का चक्कर लगा चुके थे. इलाज की सुविधा मुज़फ़्फ़रपुर को छोड़ कर कहीं नहीं है."
इस बीमारी के एक सामाजिक आर्थिक पक्ष भी सामने आया है. दिमाग़ी बुख़ार के अधिकांश पीड़ित बच्चे सामाजिक रूप से पिछड़े ग़रीब आबादी से आते हैं.
हरिवंशपुर में जहां 11 बच्चों की मौत हुई, वे सभी दलितों के बच्चे ही हैं. गांव में अन्य संपन्न जातियों के मुहल्ले में इस बीमारी का नामो निशान नहीं है.
अस्पताल अधीक्षक एसके शाही कहते हैं, "अभी तक के अधिकांश मामलों में यही देखा गया है कि जो ग़रीबों के बच्चे हैं, कुपोषित हैं, जिनके पास स्वास्थ्य सुविधाओं का घोर अभाव है और जहां पानी की समस्या है, वहीं के बच्चे मर रहे हैं. अधिकांश बच्चे शौचालय विहीन हैं. घर विहीन हैं. पीने का साफ़ पानी नहीं है."
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, साल 2014 में सबसे अधिक 355 बच्चों की मौत इनसेफ़लाइटिस के कारण हुई, जबकि 2012 में इस बीमारी से 275 बच्चों की मौत हुई थी.
जाहिर है जब तक कुपोषण नहीं ख़त्म होगा, ग़रीबी नहीं हटेगी और और ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता 24 घंटे तक नहीं होगी मौतों का सिलसिला रुक पाएगा, इसमें संदेह है.

Tuesday, June 25, 2019

रग्बी में परचम लहराती ये आदिवासी लड़कियां

'किस' के रग्बी कोच रुद्रकेश जेना का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की सहूलियतें बहाल करने में अभी भी उनका संस्थान कुछ पीछे है. लेकिन वे दावा करते हैं कि 'किस' में उपलब्ध सुविधाएं देश के दूसरे स्थानों के मुक़ाबले बेहतर हैं.
वे कहते हैं, "मैं रग्बी खेलेने वाले कई देशों का दौरा कर चुका हूं और देश के दूसरे हिस्सों में जहां रग्बी खेली जाती है उन सभी स्थानों पर भी जा चूका हूं. अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आवश्यक बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में हम अभी भी थोड़ा पीछे हैं. लेकिन यहां ट्रेनिंग के लिए आवश्यक हर चीज़ उपलब्ध है."
शायद यही कारण है कि फिलिपींस दौरे से पहले भारतीय महिला टीम के 14 दिन के प्रशिक्षण शिविर का आयोजन भी 'किस' कैंपस में ही किया गया था. इस शिविर में अलग-अलगग दक्षिणी एशियाई देशों से आए चार अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षकों ने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया.
इससे पहले डॉ सामंत ने 'किस' के खिलाड़ियों के प्रशिक्षण के लिए दक्षिण अफ्ऱीका से एक कोच को बुलाया था. फिलिपींस में जीत की 'स्टार' सुमित्रा मानती हैं कि उस प्रशिक्षण से सभी खिलाड़ियों को काफ़ी फ़ायदा हुआ.
अब तक धाविका दुती चांद ही 'किस' विश्ववियालय ('किस' का मूल प्रतिष्ठान) की 'मास्कट' रहीं हैं . लेकिन अब लगता है कि आने वाले दिनों मे खेलकूद की दुनिया में 27 हज़ार आदिवासी बच्चों के इस विशाल स्कूल से कई और सितारे उभरेंगे.
फिलिपींस की राजधानी मनीला में भारतीय महिला रग्बी टीम ने इतिहास रचा है.
एशियाई रग्बी चैंपियनशिप के आख़िरी मैच में शक्तिशाली सिंगापुर की टीम को 21-19 से हराकर भारतीय महिला टीम ने न केवल किसी '15-ए-साइड' अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में अपनी पहली जीत हासिल की, बल्कि कांस्य पदक भी जीता.
भारतीय टीम की 15 खिलाडियों में पांच ओडिशा से थीं. ये पाँचों लड़कियां भुवनेश्वर के 'कलिंग इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज' यानी 'किस' की छात्राएं हैं.
इनमें एक हैं सुमित्रा नायक जिन्होंने मैच ख़त्म होने के सिर्फ़ 2 मिनट पहले एक पेनल्टी स्कोर कर भारतीय टीम की जीत में अहम भूमिका अदा की .
उस ऐतिहासिक क्षण के बारे में पूछते ही सुमित्रा का चेहरा खिल उठता है. वे कहतीं हैं, "हमारे लिए स्कोर करना मुश्किल हो रहा था क्योंकि सिंगापुर काफ़ी तगड़ी टीम है और पिछली बार हमें बहुत बुरी तरह हरा चुकी है.''
''मैच ख़त्म होने में 2 मिनट बाक़ी थे जब मैंने तय किया की एक पेनल्टी ली जाए. मन में विश्वास था लेकिन कुछ डर भी. मैंने पेनल्टी ली और स्कोर किया. लेकिन अभी भी दो मिनट बचे थे और सिंगापुर की टीम इतनी आसानी से हार मानने वाली नहीं थी. लेकिन हमने उनके आक्रमण का डट कर मुक़ाबला किया. जब हूटर बजा और हम जीत गए, उस समय की अनुभूति मैं शब्दों में बयान नहीं कर सकती."
जाजपुर ज़िले के एक ग़रीब आदिवासी परिवार की लड़की सुमित्रा की मां की मृत्यु 1999 में हो गई थी. उस समय सुमत्रा बहुत छोटी थीं और उनके चार और भाई बहन भी थे.
सुमित्रा के पिता के लिए परिवार संभालना मुश्किल हो रहा था. साल 2006 में कहीं से उन्होंने 'किस' के बारे में सुना और सुमित्रा को वहां दाख़िल करा दिया.
बाद में उनके बाक़ी भाई-बहन भी वहां आ गए. साल 2007 में जब 'किस' की टीम ने लंदन में 14 वर्ष से कम आयु वर्ग की विश्व चैंपियनशिप का ख़िताब जीता, उसके बाद सुमित्रा रग्बी की क़ायल हो गईं और इस खेल में महारत हासिल करने की कोशिश में जी जान से जुट गईं.
विजयी भारतीय टीम में शामिल 'किस' की बाक़ी चार लड़कियों की कहानी भी सुमित्रा की कहानी से मिलती-जुलती है. केओन्झर ज़िले की मीनारानी हेम्ब्रम के पिता के गुज़र जाने के बाद उनकी मां रोज़गार की तलाश में भुवनेश्वर आ गयीं और लोगों के घरों में बर्तन मांजकर गुज़ारा करने लगीं. फिर उन्होंने 'किस' के बारे में सुना और मीना का एडमिशन वहां करवा दिया.
बेहद ग़रीब परिवार से आईं ये लड़कियां अगर आज एक अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भारत के लिए गौरव लाई हैं, तो इसका पूरा श्रेय 'किस' के फाउंडर और कंधमाल से लोकसभा के नवनिर्वाचित सदस्य डॉ अच्युत सामंत को जाता है.
उन्होंने न केवल इन लड़कियों को मुफ्त पढ़ने-लिखने का अवसर दिया बल्कि उनके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग और बुनियादी सहूलियतें भी मुहैया करवाईं.
विजयी भारतीय महिला रग्बी टीम की एक और सदस्य हुपी माझी कहती हैं, "वे तो हमारे लिए भगवान हैं. उनका ऋृण हम सात जन्मों में भी नहीं चुका सकते."
हमने डॉ. सामंत से पूछा कि उन्होंने रग्बी जैसे एक ऐसे खेल को बढ़ावा देना का क्यों सोचा जो भारत में बहुत लोकप्रिय नहीं है. इस पर उन्होंने कहा, "यह सच है की रग्बी आज भी भारत में बहुत लोकप्रिय खेल नहीं है. लेकिन ऐसा नहीं है कि हमने रग्बी के लिए ही ऐसा किया है. हमने हमेशा कोशिश की है कि सभी खेलों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों, जिससे देश के कोने-कोने में, ख़ासकर आदिवासी इलाकों में छिपी हुई प्रतिभाओं को विकसित होने का मौक़ा मिले."
'किस' के रग्बी कोच रुद्रकेश जेना का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की सहूलियतें बहाल करने में अभी भी उनका संस्थान कुछ पीछे है. लेकिन वे दावा करते हैं कि 'किस' में उपलब्ध सुविधाएं देश के दूसरे स्थानों के मुक़ाबले बेहतर हैं.
वे कहते हैं, "मैं रग्बी खेलेने वाले कई देशों का दौरा कर चुका हूं और देश के दूसरे हिस्सों में जहां रग्बी खेली जाती है उन सभी स्थानों पर भी जा चूका हूं. अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि आवश्यक बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने में हम अभी भी थोड़ा पीछे हैं. लेकिन यहां ट्रेनिंग के लिए आवश्यक हर चीज़ उपलब्ध है."
शायद यही कारण है कि फिलिपींस दौरे से पहले भारतीय महिला टीम के 14 दिन के प्रशिक्षण शिविर का आयोजन भी 'किस' कैंपस में ही किया गया था. इस शिविर में अलग-अलगग दक्षिणी एशियाई देशों से आए चार अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षकों ने खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दिया.

Sunday, June 9, 2019

يرجع تاريخ كنيسة الثالوث المقدس في روثويل إلى القرن الثالث عشر.

وخلال الدوربار، الذي يجذب الكثير من السياح، يمتطي الأمير جوادا في المدينة مصحوبا بحاشيته في أزيائهم التقليدية الملونة ثم يصطف الناس لإبداء الاحترام والتوقير له، في تقاليد تجعل سكان كانو يشعرون بالفخر.
وكانت محاولة سابقة من أحد حكام الولاية في ثمانينيات القرن الماضي لتقسيم الإمارة قد أسفرت عن وقوع اشتباكات.
تقع قرية كوردي في ولاية غوا الغربية الهندية وهي قرية لا يمكن رؤيتها إلا لمدة شهر واحد فقط كل عام، إذ تختفي تحت الماء طوال 11 شهرا. وعندما تنحسر المياه، يجتمع سكانها الأصليون، الذين استقروا الآن في مكان آخر، لإقامة احتفالات في منازلهم القديمة بالقرية.
تقرير سوبريا فوهرا يلقي الضوء على هذه القرية.
توجد القرية بين جبلين في منطقة غاتس الغربية التي يمر عبرها نهر سالاوليم، أحد روافد نهر رئيسي في غوا.
كانت تلك القرية يوما ما مزدهرة في جنوب شرق غوا.
ولم تعد القرية موجودة في عام 1986، كما يعلم سكانها. فبعد بناء أول سد في الولاية، غمرت المياه القرية بالكامل.
بيد أن المياه تنحسر كل عام في شهر مايو/أيار لتكشف ما تبقى من القرية.
وتظهر الأرض المتصدعة، وجذوع الأشجار، وبقايا منازل ومعابد دينية متآكلة، وبقايا الأدوات المنزلية، وأطلال قنوات المياه، وأميال من الأرض الجرداء التي تتقاطع مع المسطحات المائية.
كانت أرض القرية خصبة وكان معظم سكانها، الذين كان يبلغ تعدادهم نحو 3 آلاف نسمة، يعيشون فيها، ويحرثون حقول الأرز المحاطة بأشجار جوز الهند والكاجو والمانجو والجزر.
كان الهندوس والمسلمون والمسيحيون يعيشون معا. وكانت القرية تضم معبدا رئيسيا ومعابد أصغر وكنيسة وضريحا إسلاميا، وهي مسقط رأس المغنية الكلاسيكية الشهيرة موغباي كوردكار.
بيد أن الأمور تغيرت على نحو كبير بعد تحرير غوا عام 1961 من سيطرة البرتغاليينوزار داياناند باندودكار، رئيس وزراء الولاية، القرية وأعلن عن بناء السد الأول في الولاية. وجمع كل سكان القرية وأخبرهم بأنه سيفيد كل غوا الجنوبية.
ويقول جاجانان كورديكار، البالغ من العمر 75 عاما، والذي يحتفظ بذكريات حية عن اللقاء: "قال (باندودكار) إنه (السد) سوف يغرق قريتنا. لكن تضحياتنا ستكون من أجل خير أكبر".
واضطر كورديكار وغيره من السكان، وهم أكثر من 600 أسرة، إلى الانتقال إلى القرى المجاورة وحصلوا من الدولة على أرض وتعويض.
كان المشروع طموحا. وبُني السد على ضفاف نهر سالاوليم. وكان يطلق عليه اسم مشروع ري سالاوليم. ويهدف إلى توفير المياه لأغراض الشرب والري والأغراض الصناعية لمعظم منطقة غوا الجنوبية.
وكان من المفترض توفير حوالي 400 مليون لتر من المياه يوميا للمواطنين.
ويتذكر إيناسيو رودريغز: "عندما ذهبنا إلى القرية الجديدة، لم يكن لدينا أي شيء على الإطلاق". كانت عائلته من بين العائلات القليلة الأولى التي غادرت في عام 1982. وكان عليهم البقاء في منازل مؤقتة حتى يتمكنوا من بناء منزلهم من لا شيء، وطال الوقت بالنسبة للبعض لما يقرب من خمس سنوات.
كان غوروشاران كورديكار يبلغ من العمر 10 سنوات عندما انتقلت عائلته إلى قرية جديدة في عام 1986.
ويتذكر الفتى البالغ من العمر 42 عاما حاليا: "أتذكر والدي وهو يضع كل شيء على عجل في شاحنة صغيرة. كنت أجلس أنا أيضا في الشاحنة مع أخي وجدتي. كان والداي يتبعانا على دراجة".
وتتذكر والدته، مامتا كورديكار، ذلك اليوم بشكل أكثر وضوحا: "أعتقد أننا آخر العائلات القليلة التي غادرت القرية، كانت الأمطار قد هطلت بغزارة في الليلة السابقة. وبدأت المياه تدخل منزلنا من الحقول. اضطررنا إلى المغادرة على الفور. حتى لم أستطع أن آخذ معي مطحنة الدقيق".
ويوجد في قرية فاديم، التي يعيش فيها كورديكار حاليا، بئران كبيرتان. لكن في شهري أبريل/نيسان ومايو/أيار، بدأت تجف الآبار، فيضطر السكان إلى الاعتماد على خزانات الحكومة للحصول على مياه الشرب.
وعندما تنحسر المياه في مايو/أيار، يزور سكان كوردي الأصليون وطنهم المفقودويتجمع المسيحيون في عيد سنوي بكنيسة صغيرة. كما يحتفل الهندوس بأحد أعيادهم في المعبد خلال هذا الشهر.
وتقول فينيشا فرنانديز، عالمة اجتماع في غوا إنه "من السهل جدا بالنسبة لنا اليوم أن نحزم حقائبنا ونتحرك".
وأضافت: "لكن بالنسبة لشعب كوردي، كانت هويتهم مبنية على أرضهم. كانوا على صلة وثيقة ومباشرة بها. لذا ربما يتذكرون ذلك بشدة ويحرصون على العودة إليها".
كشفت الاختبارات التي أُجريت لجمجمة ترجع إلى العصور الوسطى، عُثر عليها في قبو يعود إلى القرن الثالث عشر الميلادي، عن أن الشخص المتوفى تعرض لضربة في الرأس.
ويعكف علماء آثار منذ فترة على فحص الرفات الذي عُثر عليها في كنيسة الثالوث المقدس في روثويل في نورثامبتونشير. ولا تزال عملية الدراسة مستمرة.
وفحص الخبراء خمس جماجم من بين رفات 2500 شخص، ما أسفر عن نتائج أشارت إلى أن واحدة منها فقط تعرضت لكسور.
وقالت ليزي كرايغ أتكنز، أستاذة الآثار في جامعة شيفلد، إن اكتشاف إصابة في جمجمة واحدة فقط يقلل من احتمالية حدوث "مذبحة" أدت إلى مقتل هذا العدد من الناس.
وقالت ليزي: "اخترناها (الجمجمة المصابة) لمحاولة التوصل إلى القصة وراء ما حدث، وذلك لأن المشهد يرجح، في وجود هذا الكم من الرفات، أن مذبحة ما حدثت هنا."
وأضافت: "لكنها كانت الوحيدة التي بدت عليها علامات التعرض للعنف."
وأشارت إلى أن هذه العظام ربما أُخرجت من منطقة مقابر اكتظت بالجثامين.
وقال التقرير، الذي نُشر في مجلة مورتاليتي، إن القبو بُني في ممر الكنيسة بمذبح خاص به.
ويرجع تاريخ تخزين هذه العظام والجماجم أسفل الكنيسة إلى الفترة من عام 1250 إلى عام 1900، وهو ما كشفه مسح التأريخ بالكربون المشع لتحديد عمر الرفات.
وكنيسة الثالوث المقدس واحدة من 13 موقعا تاريخيا ترجع إلى القرن الثالث عشر الميلادي في بريطانيا، أبرزها سان ليونارد في هايث في كنت.
وبالنسبة لأولئك الذين يشعرون أن هناك دوافع سياسية في ما يحدث فإنهم يأملون أن تفشل هذه المحاولة أيضا